किसी ने
हमें नहीं सिखाया
कि इस
प्रकार भी प्रेम किया जाता है।
न कोई
ग्रन्थ मिला,
न कोई
संस्कार,
न किसी
ने आशीर्वाद दिया,
न किसी
ने राह दिखाई।
हमारे
हिस्से में आए
कुछ
धीमे स्वर,
कुछ
सावधानियाँ,
कुछ
चुराए हुए क्षण,
जो
स्मृतियों में बदलने से पहले ही
विदा हो
जाया करते थे।
और
धीरे-धीरे
हम विदा
कहने की कला में
माहिर
हो गए।
हँसी के
बाद विदा।
मुलाक़ात
के बाद विदा।
लम्बे
आलिंगनों के पश्चात्
अधूरी
विदा।
उन
वचनों के साथ विदा
जो फिर
मिलने की आशा लिए होते थे।
और
कभी-कभी
इससे
पहले ही विदा,
कि
संसार को कुछ ज्ञात हो।
दूसरे
लोग
साथ-साथ
वृद्ध होने के स्वप्न देखते हैं।
हम
कैलेंडरों की ओर देखते हैं।
अवसरों
की ओर।
स्थगित
योजनाओं की ओर।
बहानों
की ओर।
और उन
दूरियों की ओर
जो
मीलों में नहीं,
लेकिन
उत्तरदायित्वों में नापी जाती हैं।
फिर भी,
एक
विचित्र चमत्कार
आज भी
विद्यमान है।
ऋतुएँ
बदल गईं।
चेहरों
ने समय का स्पर्श स्वीकार किया।
बालों
में चाँदी उतर आई।
किन्तु
प्रत्येक रात्रि,
निद्रा
से पहले,
मेरे
विचार
उसी एक
व्यक्ति की ओर प्रस्थान करते हैं।
अकेलेपन
के कारण नहीं,
अपितु
इसलिए
कि इस
विशाल संसार में
एक
आत्मा ऐसी है
जिसने
मेरी आत्मा का आकार
पहचान
लिया है।
शायद
इतिहास
हमारे
नाम कभी न जाने।
शायद
समाज
हमारी
निःशब्द निकटता को
समझ न
पाए।
किन्तु
प्रेम को
प्रशंसा
की आवश्यकता कब रही है?
उसे तो
केवल
स्थिर
बने रहने की आवश्यकता होती है।
और हम
समय, दूरी और परिस्थितियों के बीच भी
स्थिर
रहे हैं।
~ डॉ इन्ताज मलेक
