कहाँ से रह सकते हैं
अकबर द ग्रेट ?
एक ही तो है-
The
Great…!!!
इतिहास में नहीं,
न किसी तख़्त पर,
न किसी सल्तनत की
धूल भरी किताब में…
वह तो
उस आईने में रहता है
जिसमें आदमी
अपने कद से बड़ा
दिखाई देना चाहता है।
वह
मुग़ल नहीं,
मगरमच्छ-सी महत्वाकांक्षा है,
ताज नहीं,
ताज पहनने का उन्माद है।
बड़ा होने की इतनी जल्दी है
कि ऊँचाई भूल गया,
शोर इतना किया
कि अपनी ही खोखली आवाज़
उसे जयघोष लगने लगी।
बड़बोला
इतना
कि शब्द पहाड़
हो गए,
और भीतर झाँका,
तो एक कंकड़
भी नहीं।
मंच सजा,
रोशनी जली,
परदा उठा
और साहब आए
अपने ही बनाए हुए
महानता के पोस्टर से निकलकर।
तालियाँ मिलीं
तो समझे इतिहास बन गया,
भीड़ मिली
तो समझे जनमत है,
और कैमरे चमके
तो मान लिया
कि सूरज भी
उन्हीं के नाम से उगता है !
बड़ा
शोमैन,
मगर तमाशे-बाज़।
बड़ा दावेदार,
मगर भीतर से
खोखला।
बड़ा
विजेता
मगर किससे जीता,
यह आज तक
पता नहीं।
इसलिए मत कहो-
“अकबर
द ग्रेट नहीं
रहे।”
वे कैसे नहीं रहेंगे?
जब तक
खोखलापन
आत्मविश्वास का मुखौटा पहनता रहेगा,
जब तक
अहंकार
महानता का नाम लेता रहेगा,
जब तक
तमाशा
उपलब्धि समझा जाएगा
अकबर
द ग्रेट
यहीं कहीं रहेंगे।
बस फर्क इतना है की
पहले
महानता इतिहास लिखता था,
अब
महानता का विज्ञापन
खुद ही अपना इतिहास
लिखता है।
और शायद इसीलिए
एक
ही तो है
द ग्रेट!
बाकी सब
उसकी नकल में
अपने-अपने आईने
ढूँढ़ रहे हैं।
~ डॉ इन्ताज़ मलेक