मैंने
तुम्हें
सौ
कविताओं में लिखा है,
शायद
उससे भी अधिक में
इसलिए
नहीं
कि कहने
को बहुत कुछ था,
बल्कि
इसलिए
कि एक
जीवन
काफी
नहीं था
उस एहसास
को कहने के लिए
जो
तुम्हारी ख़ामोशी
मेरे
भीतर छोडे हुए है ।
मैंने
उन्हें
एक-एक
करके सँभाला,
जैसे कोई
ऐसे ख़त
सँभालता है
जिन्हें भेजने से
उसे डर
लगता हो।
फिर
मैंने
हमारे
प्रेम को
एक
सार्वजनिक आवाज़ दी।
एक शाम
सजाई,
कविताओं
का पाठ रखा,
लोगों के
बीच
एक मंच
सजाया
और उन
प्रतीक्षारत चेहरों के बीच
एक जगह
सिर्फ़
तुम्हारे लिए
बचा रखी।
तुमने
आने का वादा किया था।
मैं
श्रोताओं से अधिक
दरवाज़े
को देखता रहा।
लेकिन
तुम नहीं आए।
फिर
मैंने
अपनी
कविताएँ
एक-एक
करके
तुम्हें
भेजनी शुरू कीं
हर कविता
में
मेरी
साँस का अंश था,
और हर
पंक्ति के बीच
मेरे मन
का
कोई
अनकहा हिस्सा।
तुम
व्यस्त थे।
इतने
व्यस्त
कि एक
कविता पढ़ने का समय भी
तुम्हें
नहीं मिला।
और मैंने
स्वयं को समझाया
शायद कल।
शायद जब
दुनिया
थोड़ी
शांत होगी,
शायद जब
तुम्हारे हाथ
थोड़े
खाली होंगे,
शायद जब
जीवन
तुमसे
इतनी माँग
नहीं
करेगा
तब तुम
पढ़ोगे।
लेकिन कल
एक और कल
होता गया।
और मेरी
कविताएँ
वहीं
पड़ी रहीं।
प्रतीक्षा
करती हुईं,
जैसे बंद
खिड़कियाँ
किसी ऐसे
आकाश की ओर खुली हों
जो कभी
उनकी ओर
देखता ही
नहीं।
कभी-कभी
सोचता हूँ
ज़्यादा
पीड़ा किसमें है?
इसमें
कि तुमने
उन्हें कभी पढ़ा ही नहीं
या इसमें
कि तुमने
पढ़ा।
कि अपनी
भागती हुई दुनिया के बीच
किसी एक
ख़ामोश क्षण में
तुमने
उन्हें खोला,
एक-एक
शब्द पढ़ा,
और वही
सब महसूस किया
जो मैंने
महसूस किया
वह
कोमलता,
वह
प्रतीक्षा,
वोह
मैंने तुम्हें
सौ
कविताओं में लिखा,
शायद
उससे भी अधिक में
इसलिए
नहीं
कि कहने
को बहुत कुछ था,
बल्कि
इसलिए
कि एक
जीवन
काफी
नहीं था
उस एहसास
को कहने के लिए
जो
तुम्हारी ख़ामोशी
मेरे
भीतर छोड़ गई थी।
मैंने
उन्हें
एक-एक
करके सँभाला,
जैसे कोई
ऐसे ख़त
सँभालता है
जिन्हें
भेजने से
डर लगता
हो।
फिर
मैंने
हमारे
प्रेम को
एक
सार्वजनिक आवाज़ दी।
एक शाम
सजाई,
कविताओं
का पाठ रखा,
लोगों के
बीच
एक मंच
बनाया
और उन
प्रतीक्षारत चेहरों के बीच
एक जगह
सिर्फ़
तुम्हारे लिए
बचा रखी।
तुमने
आने का वादा किया था।
मैं
श्रोताओं से अधिक
दरवाज़े
को देखता रहा।
लेकिन
तुम नहीं आए।
फिर
मैंने
अपनी
कविताएँ
एक-एक
करके
तुम्हें
भेजनी शुरू कीं
हर कविता
में
मेरी
साँस का थोड़ा-सा अंश था,
और हर
पंक्ति के बीच
मेरे मन
का
कोई
अनकहा हिस्सा।
तुम
व्यस्त थे।
इतने
व्यस्त
कि एक
कविता पढ़ने का समय भी
तुम्हें
नहीं मिला।
और मैंने
स्वयं को समझाया
शायद कल।
शायद जब
दुनिया
थोड़ी
शांत होगी,
शायद जब
तुम्हारे हाथ
थोड़े
खाली होंगे,
शायद जब
जीवन
तुमसे
इतनी माँग
नहीं
करेगा।
लेकिन कल
एक और कल
होता गया।
और मेरी
कविताएँ
वहीं
पड़ी रहीं
प्रतीक्षा
करती हुईं,
जैसे बंद
खिड़कियाँ
किसी ऐसे
आकाश की ओर खुली हों
जो कभी
उनकी ओर
देखता ही
नहीं।
कभी-कभी
सोचता हूँ
ज़्यादा
पीड़ा किसमें है?
इसमें
कि तुमने
उन्हें कभी पढ़ा ही नहीं
या इसमें
कि तुमने
पढ़ा।
कि अपनी
भागती हुई दुनिया के बीच
किसी एक
ख़ामोश क्षण में
तुमने
उन्हें खोला,
एक-एक
शब्द पढ़ा,
और वही
सब महसूस किया
जो मैंने
महसूस किया है
वोह
कोमलता,
वोह
प्रतीक्षा,
वोह बीते
हुए वर्ष,
वोह
अनकही बातें
जो
साधारण शब्दों की रोशनी में
कभी
जीवित नहीं रह सकती थीं।
अगर
तुमने उन्हें नहीं पढ़ा,
तो शायद
मेरे
शब्द केवल मेरे थे।
लेकिन
अगर तुमने पढ़ा है,
तो शायद
तुम जानते हो
कि अब
मैं लिखते हुए भी
एक ख़ाली
कुर्सी की आवाज़
क्यों
सुनता हूँ।
मैंने
सैकड़ों कविताएँ लिखीं
तुम्हें
वह सब बताने के लिए
जो कह
नहीं सका।
तुम
उन्हें सुनने
कभी नहीं
आए।
और अब
मेरे भीतर
एक कवि
का सबसे कठोर प्रश्न
बचा हुआ
है
शायद
तुमने
उन्हें पढ़ा ही नहीं।
और
शायद
तुमने पढ़ लिया हो तो?
क्योंकि
अगर तुमने पढ़ा है,
और वही
महसूस किया है
जो मैंने
महसूस किया,
और जानते
हो
कि मैं
आज भी क्या महसूस कर रहा हूँ
तो
तुम्हारी ख़ामोशी
अनजान
होने की ख़ामोशी नहीं है।
~ डॉ इन्ताज मलेक