कृष्ण की बाँसुरी से
एक मधुर स्वर बहता है
एक अद्भुत धुन,
जैसे रहस्यमयी नदियाँ
अपने अनंत प्रवाह के साथ बहती हों।
वह एक-एक स्वर छेड़ते है,
और हर स्वर
अपने आप में एक कलाकृति बन जाता है
प्रेम का ऐसा गीत
जो हर हृदय को छू जाता है।
वृंदावन में,
जहाँ फूल अपनी पूरी कोमलता में खिलते हैं,
कृष्ण खड़े हैं
चेहरे पर एक सहज मुस्कान लिए।
कमल की पंखुड़ियों जैसे
उनके नेत्र,
गहरे और शांत,
और उनके पावन अधरों पर
बाँसुरी
जिससे ऐसी मधुर धुन जन्म लेती है
जो दिखाई नहीं देती,
केवल महसूस होती है।
मोर नृत्य करने लगते हैं,
गाएँ मस्ती में झूम उठती हैं,
जब कृष्ण का संगीत
भोर की पहली साँस में
चारों ओर भर जाता है।
गोपियाँ उनके चारों ओर
एकत्र होती हैं,
उनके हृदय जैसे आपस में जुड़ जाते हैं,
और कृष्ण की उस अलौकिक धुन में
वे प्रेम का वह अनुभव पाती हैं
जिसकी उन्हें तलाश थी।
यमुना की धारा
निर्मल, पारदर्शी और पवित्र,
उस आकाश को अपने भीतर प्रतिबिंबित करती है
जहाँ कृष्ण के गीत
अनंत आकाश तक गूँजते रहते हैं।
वह जल पर नृत्य करते हैं
एक ऐसा दृश्य
जो दिव्यता से भर उठता है।
कृष्ण की उपस्थिति में
चिंताएँ जैसे स्वयं
अपना स्थान छोड़ देती हैं।
वे गोवर्धन पर्वत उठा लेते
हैं
अद्भुत शक्ति के साथ,
अपनी पवित्र धरती के
अपने लोगों के रक्षक बनकर।
गाएँ और बछड़े
उनके प्रिय साथी हैं,
और कृष्ण के प्रेम में
हर संघर्ष
शांत होकर मिटने लगता है।
राधा
उनकी प्रिय,
एक दिव्य प्रेम-कथा।
कृष्ण की बाँहों में
दोनों की आत्माएँ
एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं।
गोपियों की भक्ति
इतनी निर्मल,
इतनी गहरी प्रेममय
कि कृष्ण के आलिंगन में
उनके हृदयों को
पूर्ण आश्रय मिल जाता है।
फिर वही कृष्ण
एक दिव्य सारथी बनकर
युद्धभूमि में खड़े होते हैं।
प्रेम और करुणा से
अर्जुन के हृदय का मार्गदर्शन करते हुए
वे उसे जीवन का सत्य समझाते हैं।
भगवद्गीता
उनकी गहन प्रज्ञा का स्वरूप,
जिसके उपदेशों में
सत्य अपना प्रकाश पाता है।
बचपन के उन चंचल,
खेलते-कूदते दिनों से लेकर
ज्ञान की गंभीरता तक
कृष्ण का जीवन
एक पवित्र यात्रा की तरह है,
जिसमें हर पड़ाव
एक अर्थ छोड़ जाता है।
भक्तों के हृदय में
आज भी उनका प्रेम निवास करता है,
और कृष्ण की शाश्वत उपस्थिति में
हम सब
अपना विश्वास और सहारा पाते हैं।
मंदिरों में,
घरों में,
हम उनकी मूर्तियों को
श्रद्धा से निहारते और पूजते हैं।
कवियों की पंक्तियों में
हम उनकी कथाओं को फिर-फिर खोजते हैं।
कृष्ण
हमारे प्रिय,
हम अपने हृदय में उन्हें सँजोए रखते हैं।
उनके प्रेम में,
उनकी कृपा में,
हमारी आत्माएँ
और गहराई तक उतरती चली जाती हैं।
आओ,
हम कृष्ण का उत्सव मनाएँ
अद्भुत, सुंदर और सत्य कृष्ण का।
उनके नाम में,
उनके प्रेम में
हमारी आत्माएँ
फिर से नई हो उठें।
यमुना के तट से लेकर
आकाश की अनंत ऊँचाइयों तक,
कृष्ण के उस शाश्वत आलिंगन
में
हमें मिलता है
एक ऐसा प्रेम
जिसका कोई अंत नहीं।
~ डॉ इन्ताज मलेक