Zen

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Sunday, 13 September 2026

वोह कविताएँ तुमने पढ़ी ही नहीं


मैंने तुम्हें

सौ कविताओं में लिखा है,

शायद उससे भी अधिक में

 

इसलिए नहीं

कि कहने को बहुत कुछ था,

बल्कि इसलिए

कि एक जीवन

काफी नहीं था

उस एहसास को कहने के लिए

जो तुम्हारी ख़ामोशी

मेरे भीतर छोडे हुए है ।

 

मैंने उन्हें

एक-एक करके सँभाला,

जैसे कोई

ऐसे ख़त सँभालता है

जिन्हें  भेजने से

उसे डर लगता हो।

 

फिर मैंने

हमारे प्रेम को

एक सार्वजनिक आवाज़ दी।

 

एक शाम सजाई,

कविताओं का पाठ रखा,

लोगों के बीच

एक मंच सजाया

 

और उन प्रतीक्षारत चेहरों के बीच

एक जगह

सिर्फ़ तुम्हारे लिए

बचा रखी।

 

तुमने आने का वादा किया था।

 

मैं श्रोताओं से अधिक

दरवाज़े को देखता रहा।

 

लेकिन तुम नहीं आए।

 

फिर मैंने

अपनी कविताएँ

एक-एक करके

तुम्हें भेजनी शुरू कीं

 

हर कविता में

मेरी साँस का अंश था,

और हर पंक्ति के बीच

मेरे मन का

कोई अनकहा हिस्सा।

 

तुम व्यस्त थे।

 

इतने व्यस्त

कि एक कविता पढ़ने का समय भी

तुम्हें नहीं मिला।

 

और मैंने स्वयं को समझाया

शायद कल।

 

शायद जब दुनिया

थोड़ी शांत होगी,

शायद जब तुम्हारे हाथ

थोड़े खाली होंगे,

शायद जब जीवन

तुमसे इतनी माँग

नहीं करेगा

तब तुम पढ़ोगे।

 

लेकिन कल

एक और कल होता गया।

 

और मेरी कविताएँ

वहीं पड़ी रहीं।

 

प्रतीक्षा करती हुईं,

जैसे बंद खिड़कियाँ

किसी ऐसे आकाश की ओर खुली हों

जो कभी उनकी ओर

देखता ही नहीं।

 

कभी-कभी सोचता हूँ

ज़्यादा पीड़ा किसमें है?

 

इसमें

कि तुमने उन्हें कभी पढ़ा ही नहीं

 

या इसमें

कि तुमने पढ़ा।

 

कि अपनी भागती हुई दुनिया के बीच

किसी एक ख़ामोश क्षण में

तुमने उन्हें खोला,

एक-एक शब्द पढ़ा,

और वही सब महसूस किया

जो मैंने महसूस किया

 

वह कोमलता,

वह प्रतीक्षा,

वोह मैंने तुम्हें

सौ कविताओं में लिखा,

शायद उससे भी अधिक में

 

इसलिए नहीं

कि कहने को बहुत कुछ था,

बल्कि इसलिए

कि एक जीवन

काफी नहीं था

उस एहसास को कहने के लिए

जो तुम्हारी ख़ामोशी

मेरे भीतर छोड़ गई थी।

 

मैंने उन्हें

एक-एक करके सँभाला,

जैसे कोई

ऐसे ख़त सँभालता है

जिन्हें भेजने से

डर लगता हो।

 

फिर मैंने

हमारे प्रेम को

एक सार्वजनिक आवाज़ दी।

 

एक शाम सजाई,

कविताओं का पाठ रखा,

लोगों के बीच

एक मंच बनाया

 

और उन प्रतीक्षारत चेहरों के बीच

एक जगह

सिर्फ़ तुम्हारे लिए

बचा रखी।

 

तुमने आने का वादा किया था।

 

मैं श्रोताओं से अधिक

दरवाज़े को देखता रहा।

 

लेकिन तुम नहीं आए।

 

फिर मैंने

अपनी कविताएँ

एक-एक करके

तुम्हें भेजनी शुरू कीं

 

हर कविता में

मेरी साँस का थोड़ा-सा अंश था,

और हर पंक्ति के बीच

मेरे मन का

कोई अनकहा हिस्सा।

 

तुम व्यस्त थे।

इतने व्यस्त

कि एक कविता पढ़ने का समय भी

तुम्हें नहीं मिला।

 

और मैंने स्वयं को समझाया

शायद कल।

 

शायद जब दुनिया

थोड़ी शांत होगी,

शायद जब तुम्हारे हाथ

थोड़े खाली होंगे,

शायद जब जीवन

तुमसे इतनी माँग

नहीं करेगा।

 

लेकिन कल

एक और कल होता गया।

 

और मेरी कविताएँ

वहीं पड़ी रहीं

 

प्रतीक्षा करती हुईं,

जैसे बंद खिड़कियाँ

किसी ऐसे आकाश की ओर खुली हों

जो कभी उनकी ओर

देखता ही नहीं।

 

कभी-कभी सोचता हूँ

ज़्यादा पीड़ा किसमें है?

 

इसमें

कि तुमने उन्हें कभी पढ़ा ही नहीं

या इसमें

 

कि तुमने पढ़ा।

 

कि अपनी भागती हुई दुनिया के बीच

किसी एक ख़ामोश क्षण में

तुमने उन्हें खोला,

एक-एक शब्द पढ़ा,

और वही सब महसूस किया

जो मैंने महसूस किया है

 

वोह कोमलता,

वोह प्रतीक्षा,

वोह बीते हुए वर्ष,

वोह अनकही बातें

जो साधारण शब्दों की रोशनी में

कभी जीवित नहीं रह सकती थीं।

 

अगर तुमने उन्हें नहीं पढ़ा,

तो शायद

मेरे शब्द केवल मेरे थे।

 

लेकिन अगर तुमने पढ़ा है,

तो शायद तुम जानते हो

कि अब मैं लिखते हुए भी

एक ख़ाली कुर्सी की आवाज़

क्यों सुनता हूँ।

 

मैंने सैकड़ों कविताएँ लिखीं

तुम्हें वह सब बताने के लिए

जो कह नहीं सका।

 

तुम उन्हें सुनने

कभी नहीं आए।

 

और अब मेरे भीतर

एक कवि का सबसे कठोर प्रश्न

बचा हुआ है

 

शायद

तुमने उन्हें पढ़ा ही नहीं।

 

और

शायद तुमने पढ़ लिया हो तो?

 

क्योंकि अगर तुमने पढ़ा है,

और वही महसूस किया है

जो मैंने महसूस किया,

और जानते हो

कि मैं आज भी क्या महसूस कर रहा हूँ

 

तो तुम्हारी ख़ामोशी

अनजान होने की ख़ामोशी नहीं है।

 

~ डॉ इन्ताज मलेक

 

  

Saturday, 12 September 2026

कृष्ण की बाँसुरी

कृष्ण की बाँसुरी से
एक मधुर स्वर बहता है
एक अद्भुत धुन,
जैसे रहस्यमयी नदियाँ
अपने अनंत प्रवाह के साथ बहती हों।

वह एक-एक स्वर छेड़ते है,
और हर स्वर
अपने आप में एक कलाकृति बन जाता है
प्रेम का ऐसा गीत
जो हर हृदय को छू जाता है।

वृंदावन में,
जहाँ फूल अपनी पूरी कोमलता में खिलते हैं,
कृष्ण खड़े हैं
चेहरे पर एक सहज मुस्कान लिए।

कमल की पंखुड़ियों जैसे उनके नेत्र,
गहरे और शांत,
और उनके पावन अधरों पर
बाँसुरी
जिससे ऐसी मधुर धुन जन्म लेती है
जो दिखाई नहीं देती,
केवल महसूस होती है।

मोर नृत्य करने लगते हैं,
गाएँ मस्ती में झूम उठती हैं,
जब कृष्ण का संगीत
भोर की पहली साँस में
चारों ओर भर जाता है।

गोपियाँ उनके चारों ओर एकत्र होती हैं,
उनके हृदय जैसे आपस में जुड़ जाते हैं,
और कृष्ण की उस अलौकिक धुन में
वे प्रेम का वह अनुभव पाती हैं
जिसकी उन्हें तलाश थी।

यमुना की धारा
निर्मल, पारदर्शी और पवित्र,
उस आकाश को अपने भीतर प्रतिबिंबित करती है
जहाँ कृष्ण के गीत
अनंत आकाश तक गूँजते रहते हैं।

वह जल पर नृत्य करते हैं
एक ऐसा दृश्य
जो दिव्यता से भर उठता है।

कृष्ण की उपस्थिति में
चिंताएँ जैसे स्वयं
अपना स्थान छोड़ देती हैं।

वे गोवर्धन पर्वत उठा लेते हैं
अद्भुत शक्ति के साथ,
अपनी पवित्र धरती के
अपने लोगों के रक्षक बनकर।

गाएँ और बछड़े
उनके प्रिय साथी हैं,
और कृष्ण के प्रेम में
हर संघर्ष
शांत होकर मिटने लगता है।

राधा
उनकी प्रिय,
एक दिव्य प्रेम-कथा।

कृष्ण की बाँहों में
दोनों की आत्माएँ
एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं।

गोपियों की भक्ति
इतनी निर्मल,
इतनी गहरी प्रेममय
कि कृष्ण के आलिंगन में
उनके हृदयों को
पूर्ण आश्रय मिल जाता है।

फिर वही कृष्ण
एक दिव्य सारथी बनकर
युद्धभूमि में खड़े होते हैं।

प्रेम और करुणा से
अर्जुन के हृदय का मार्गदर्शन करते हुए
वे उसे जीवन का सत्य समझाते हैं।

भगवद्गीता
उनकी गहन प्रज्ञा का स्वरूप,
जिसके उपदेशों में
सत्य अपना प्रकाश पाता है।

बचपन के उन चंचल,
खेलते-कूदते दिनों से लेकर
ज्ञान की गंभीरता तक
कृष्ण का जीवन
एक पवित्र यात्रा की तरह है,
जिसमें हर पड़ाव
एक अर्थ छोड़ जाता है।

भक्तों के हृदय में
आज भी उनका प्रेम निवास करता है,
और कृष्ण की शाश्वत उपस्थिति में
हम सब
अपना विश्वास और सहारा पाते हैं।

मंदिरों में,
घरों में,
हम उनकी मूर्तियों को
श्रद्धा से निहारते और पूजते हैं।

कवियों की पंक्तियों में
हम उनकी कथाओं को फिर-फिर खोजते हैं।

कृष्ण
हमारे प्रिय,
हम अपने हृदय में उन्हें सँजोए रखते हैं।

उनके प्रेम में,
उनकी कृपा में,
हमारी आत्माएँ
और गहराई तक उतरती चली जाती हैं।

आओ,
हम कृष्ण का उत्सव मनाएँ
अद्भुत, सुंदर और सत्य कृष्ण का।

उनके नाम में,
उनके प्रेम में
हमारी आत्माएँ
फिर से नई हो उठें।

यमुना के तट से लेकर
आकाश की अनंत ऊँचाइयों तक,

कृष्ण के उस शाश्वत आलिंगन में
हमें मिलता है
एक ऐसा प्रेम
जिसका कोई अंत नहीं।

 

~ डॉ इन्ताज मलेक