Zen

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Sunday, 20 September 2026

पहली नज़र

तुम मेरे जीवन में
किसी आकस्मिक घटना की तरह नहीं आए
न कोई उद्घोष था,
न कोई ऐसा कोलाहल
जिसने तुम्हारे आगमन की घोषणा की हो।

तुम्हारा आना तो
एक मौन परिवर्तन था
मानो समूचा संसार
धीरेधीरे अपनी धुरी पर
कुछ इस प्रकार पुनः संतुलित हो रहा हो
कि उसे केवल
मेरे भीतर का सबसे सजग,
सबसे संवेदनशील अंश ही
पहचान सका।

सब कुछ आरम्भ हुआ
एक दृष्टि से।

वह क्षणिक दृष्टि नहीं थी,
बल्कि उतनी देर तक ठहरी हुई
कि बिना शब्दों के ही
यह संकेत दे सके
कि हमारे बीच
कुछ अनकहा स्वीकार लिया गया है।

उस एक क्षण में
संसार अपनी गति से चलता रहा
लोग आतेजाते रहे,
समय अपनी धारा में बहता रहा,
जीवन का परिचित कोलाहल
वैसा ही बना रहा—

किन्तु मेरे भीतर
कुछ बदल चुका था।

वह केवल आकर्षण नहीं था;
वह तो पहचान थी—
मानो मेरे अस्तित्व का कोई अंश
बहुत पहले से
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था।

न सचेत रूप से,
न किसी संकल्प के साथ,
बल्कि उस गहरे,
बहुत प्राचीन अंतराल में
जहाँ आकांक्षाएँ जन्म लेती हैं
उससे भी पहले
कि उन्हें भाषा मिल सके।

तुम वहाँ खड़े थे
न स्वयं पर किसी का ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा,
न अपने होने के अतिरिक्त
कुछ और देने का प्रयास।

फिर भी,
तुम्हारी उस शांत उपस्थिति में
एक अद्भुत गुरुत्व था,
जिसने बिना किसी प्रतिरोध के
मुझे अपनी ओर खींच लिया।

और उसी क्षण
मैंने वह सत्य जाना
जिसे केवल अनुभवों से नहीं सीखा जा सकता।

जीवन की कुछ मुलाकातें
हमारे जीवन में इसलिए नहीं आतीं
कि उनका अर्थ समझाया जा सके;

वे आती हैं
केवल अनुभव की जाने के लिए,
स्मृतियों में अमर हो जाने के लिए,

और बहुत शांत,
बहुत निस्संग ढंग से
हमारे भीतर ही भीतर
हमें रूपांतरित करने की प्रक्रिया
आरम्भ कर देने के लिए।

 हर सुबह,

लगभग एक ही समय पर,

दो शब्द जाया करते थे,               

Good Morning

मानो कोई नन्ही चिड़िया

अपने घर लौट आई हो

 दुनिया के लिए

वे साधारण शब्द थे

 पर किसी प्रतीक्षारत दिल के लिए,

वे धूप भी थे
और छाँव भी

चार साल बीत गए थे

जब स्पर्श ने वहाँ बातें की थीं,
जहाँ शब्द पहुँच पाए थे

 चार साल...

व्यस्तताओं के
परिवार की ज़िम्मेदारियों के,
व्यापार की पुकारों के,
समारोहों के,
कर्तव्यों के,
और टलते चले गए वादों के

फिर भी,

एक भी सुबह ऐसी नहीं आई
जिसमें वह अभिवादन अनुपस्थित रहा हो

भेजने वाला प्रेम करता था

पाने वाला यह जानता था

प्रेम जीवित है

उस नियमित आगमन में,
उन साधारण-सी प्रतीत होने वाली चिन्ताओं में,
भोर से पहले भेजे गए संदेशों में,
और आधी रात के बाद बाँटे गए विचारों में

किन्तु एक हृदय
अनेक संसारों का था

परिवार का,
दायित्वों का,
प्रतिष्ठा का,
कर्तव्य का

और कहीं बहुत भीतर,
सावधानी से सँजोए हुए
एक अद्वितीय प्रेम का

दूसरा हृदय

लगभग सम्पूर्ण रूप से
उसी प्रेम का था

बसयही अन्तर था

जब भी मिलन निकट प्रतीत हुआ,

संसार बीच में खड़ा हुआ

कभी कोई पारिवारिक आयोजन,
कभी कोई आकस्मिक दायित्व,
कभी कोई ऐसी ज़िम्मेदारी
जिसे टाला जा सके

क्षमायाचनाएँ आती

और उनके पीछे
क्षमा भी

प्रेम और कर भी क्या सकता था?

एक सुबह,

उस परिचित अभिवादन को पढ़कर
मन में एक उत्तर आकार लेने लगा

"कितना सुन्दर है यह जानना
कि उस सूर्योदय में भी
मुझे स्मरण किया जाता है,
जो किसी और के आँगन का है"

शब्द कुछ देर ठहरे

फिर खो गए 

और उनकी जगह आया
एक सरल उत्तर

"Good morning"

कुछ ही क्षणों बाद,

परदे पर एक छोटा-सा हृदय उभर आया

 और कुछ नहीं

आलिंगन

चुराई हुई कोई दोपहर या शाम

प्रतीक्षा की पूर्णता

केवल एक छोटा-सा लाल प्रतिक,

जो दो अलग-अलग संसारों के बीच
मौन प्रकाश-सा
टिमटिमा रहा था

और फिर भी,

उस एक क्षण के लिए,

वह पर्याप्त था

क्योंकि कभी-कभी प्रेम

उससे जीवित नहीं रहता
जो उसे प्राप्त होता है,

बल्कि उस विश्वास से

कि संसार के असंख्य कर्तव्यों के बीच भी,

कहीं कोई है,

जो हर सुबह

अब भी

उसे याद करता है

 

डॉ. इंताज़ मलेक