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Friday, 16 October 2026

भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में चौंसठ योगिनियाँ

 

भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में चौंसठ योगिनियाँ

डॉ. इन्ताज़ मलेक

चौंसठ योगिनियों की परम्परा भारतीय धर्म, दर्शन, शक्ति-उपासना और तान्त्रिक साधना का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, प्राचीन तथा बहुआयामी अध्याय है। योगिनियों का उल्लेख करते समय यह समझना आवश्यक है कि उन्हें केवल किसी देवी की परिचारिकाओं या अलौकिक शक्तियों के समूह के रूप में सीमित नहीं किया जा सकता। विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों और साधना-परम्पराओं में वे देवीशक्ति के विविध रूपों, प्रकृति की विलक्षण ऊर्जाओं, संरक्षण और संहार की शक्तियों तथा चेतना के रहस्यमय आयामों से सम्बद्ध दिखाई देती हैं। कहीं उनका स्वरूप मातृकाओं से जुड़ा है, कहीं वे स्वतंत्र देवियों के रूप में प्रतिष्ठित हैं और कहीं उनका सम्बन्ध विशिष्ट दिशाओं, पीठों, मण्डलों तथा तान्त्रिक अनुष्ठानों से है। इसीलिए चौंसठ योगिनियों को समझने के लिए एक ही नामावली को सम्पूर्ण भारत की सभी परम्पराओं का सार्वभौमिक प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।

संस्कृत में ‘योगिनी’ शब्द का सम्बन्ध ‘योग’ से है, जिसका अर्थ केवल शारीरिक आसन नहीं, बल्कि साधना, संयम, आध्यात्मिक अनुशासन और चेतना के गहन अनुभवों से भी है। स्त्रीलिंग में ‘योगिनी’ का अर्थ योगसाधना में सिद्ध स्त्री अथवा योगशक्ति से सम्पन्न देवी भी हो सकता है। शक्ति-परम्परा में योगिनियों का स्वरूप कभी सौम्य, कभी उग्र, कभी रक्षक और कभी भयावह दिखाई देता है। उनके कुछ नाम पशु-पक्षियों के मुख, असाधारण शारीरिक विशेषताओं, कपाल, श्मशान अथवा संहारकारी शक्ति का संकेत करते हैं। इन रूपों को केवल भय उत्पन्न करने वाली कल्पनाएँ समझने के बजाय उस धार्मिक दृष्टि से भी देखा जा सकता है जिसमें जीवन और मृत्यु, सौन्दर्य और विकरालता, संरक्षण और विनाश—सभी को व्यापक शक्ति के विविध आयाम माना जाता है। फिर भी प्रत्येक नाम का एक ही दार्शनिक अर्थ निश्चित कर देना उचित नहीं है; उसके लिए सम्बन्धित ग्रन्थ, प्रसंग और मूर्तिकला का अलग-अलग अध्ययन आवश्यक है।

चौंसठ की संख्या भी प्रतीकात्मक महत्त्व रखती है। आठ का आठ से गुणन करने पर चौंसठ प्राप्त होते हैं। भारतीय धार्मिक और तान्त्रिक परम्पराओं में आठ दिशाओं, आठ मातृकाओं तथा अनेक प्रकार की चौंसठ कलाओं, सिद्धियों और शक्तियों का उल्लेख मिलता है। कुछ योगिनी-परम्पराओं में आठ मातृकाओं से सम्बद्ध आठ-आठ योगिनियों की कल्पना की गई है, जबकि दूसरी परम्पराएँ योगिनियों को देवी के स्वतंत्र रूपों के रूप में प्रस्तुत करती हैं। अतः यह मानना कि प्रत्येक ग्रन्थ में ठीक एक ही प्रकार से आठ मातृकाओं के अधीन आठ-आठ योगिनियाँ हैं।

योगिनी-उपासना का ऐतिहासिक महत्त्व उसके मन्दिरों से भी स्पष्ट होता है। ओडिशा के हिरापुर और रानीपुर-झरियाल तथा मध्य प्रदेश के भेड़ाघाट और मितावली जैसे स्थलों पर योगिनी-सम्बन्धी मन्दिर और मूर्तिकला भारतीय स्थापत्य की विशिष्ट परम्परा के साक्ष्य हैं। अनेक योगिनी-मन्दिर खुले आकाश के नीचे वृत्ताकार अथवा वृत्त-सदृश योजना में निर्मित हैं। इस स्थापत्य में देवियों की परिक्रमा, मण्डल की अवधारणा और दिशाओं में शक्तियों की स्थापना जैसे धार्मिक विचारों की सम्भावित भूमिका पर विचार किया जाता है। तथापि हर मन्दिर की योजना, तिथि, मूर्तियों की पहचान और अनुष्ठान-पद्धति को उसके अपने पुरातात्त्विक तथा ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर ही समझना चाहिए। किसी मन्दिर की सभी मूर्तियों को बिना प्रमाण किसी एक पुराण की नामावली से जोड़ देना विश्वसनीय पद्धति नहीं है।

पुराणों में चौंसठ योगिनियाँ: अनेक परम्पराएँ

चौंसठ योगिनियों के अध्ययन में स्कन्दपुराण, अग्निपुराण और कालिकापुराण विशेष रूप से प्रासंगिक हैं। इनके साथ कुछ तान्त्रिक ग्रन्थों में भी योगिनी-मण्डलों और उनसे सम्बद्ध देवियों की चर्चा मिलती है। इन ग्रन्थों को एक-दूसरे का पर्याय मानकर पढ़ना भूल होगी, क्योंकि इनमें योगिनियों के नाम, वर्गीकरण और धार्मिक प्रसंग भिन्न हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, स्कन्दपुराण के काशीखण्ड में काशी की योगिनियों के आगमन और उनकी महिमा से सम्बन्धित प्रसंग के अन्तर्गत चौंसठ नामों की एक विशिष्ट सूची आती है। दूसरी ओर, अग्निपुराण में योगिनियों का वर्गीकरण अलग रूप में मिलता है, जिसमें दिशाओं तथा समूहों के आधार पर नामों का विन्यास किया गया है। कालिकापुराण की शक्ति-प्रधान परम्परा में योगिनियों और मातृकाओं का सम्बन्ध भी अपने विशिष्ट धार्मिक सन्दर्भ में समझना होता है।

इसलिए नीचे दी जा रही नामावली को स्पष्ट रूप से स्कन्दपुराण, काशीखण्ड, अध्याय ४५, श्लोक ३४–४१ में उद्धृत चौंसठ योगिनियों की सूची के रूप में प्रस्तुत किया है। यह समस्त पुराणों की संयुक्त सूची नहीं है। नामों के अर्थ उनके संस्कृत शब्दों और समासों के आधार पर दिए गए सम्भवित अर्थ हैं; जहाँ अर्थ या पाठ में अनिश्चितता है, वहाँ उन्हें निश्चित ऐतिहासिक अथवा धार्मिक पहचान के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

स्कन्दपुराण में उल्लिखित चौंसठ योगिनियाँ

स्कन्दपुराण की इस नामावली की एक विशेषता यह है कि इसमें योगिनियों के नाम प्रकृति, पशु-पक्षियों, शरीर की असाधारण विशेषताओं, अस्त्रों, कपालों, मृत्यु तथा दिव्य तेज से जुड़े हुए हैं। नीचे प्रत्येक नाम के साथ उसका सामान्य संस्कृत अर्थ या सम्भवित भावार्थ दिया है। ये अर्थ नामों की भाषाकी द्रष्टि से  व्याख्या हैं; इन्हें प्रत्येक योगिनी की प्रमाणित कथा, स्वतंत्र पूजा-विधि अथवा ऐतिहासिक मूर्ति-पहचान नहीं है।

प्रथम से आठवीं योगिनी तक—(१) गजानना का अर्थ है हाथी के समान मुख वाली; यह नाम हाथी के मुख की विशिष्ट आकृति का संकेत करता है। (२) सिंहमुखी सिंहमुख वाली योगिनी हैं, जिनका नाम शक्ति और उग्रता की छवि प्रस्तुत करता है। (३) गृध्रास्या का अर्थ है गिद्ध के समान मुख वाली। (४) काकतुण्डिका कौए की चोंच के समान मुख अथवा चोंच वाली आकृति का संकेत करती हैं। (५) उष्ट्रग्रीवा ऊँट जैसी गर्दन वाली हैं। (६) हयग्रीवा घोड़े की गर्दन अथवा अश्व-सदृश आकृति से सम्बद्ध नाम है। (७) वाराही वराह अर्थात् जंगली सूअर से सम्बन्धित देवी-रूप हैं; वाराही का व्यापक सम्बन्ध शक्ति और मातृका-परम्परा से भी है। (८) शरभानना का अर्थ शरभ नामक पौराणिक प्राणी के समान मुख वाली है; शरभ की आकृति विभिन्न परम्पराओं में भिन्न प्रकार से वर्णित मिलती है।

नवीं से सोलहवीं योगिनी तक—(९) उलूकिका उल्लू से सम्बन्धित रूप का संकेत करती हैं। (१०) शिवारावा का अर्थ पाठ और व्युत्पत्ति के अनुसार पूरी निश्चितता से बताना कठिन है; इसे बिना अतिरिक्त प्रमाण किसी विशेष कथा से जोड़ना उचित नहीं होगा। (११) मयूरी मोरनी अथवा मयूर-सम्बन्धी स्वरूप है। (१२) विकटानना असाधारण, विकराल अथवा विचित्र मुख वाली हैं। (१३) अष्टवक्रा आठ स्थानों पर वक्रता वाली अथवा अत्यन्त वक्र आकृति वाली का अर्थ देती हैं। (१४) कोटराक्षी गहरी, गड्ढे जैसी अथवा कोटर-सदृश आँखों वाली का बोध कराती हैं। (१५) कुब्जा झुकी हुई अथवा कूबड़ वाली आकृति का नाम है। (१६) विकटलोचना असाधारण, विशाल या विकराल नेत्रों वाली योगिनी हैं।

सत्रहवीं से चौबीसवीं योगिनी तक—(१७) शुष्कोदरी सूखे अथवा भीतर धँसे उदर वाली आकृति का संकेत करती हैं। (१८) ललज्जिह्वा का पाठ और उसका सटीक अर्थ मानक अनुवादों में स्पष्ट रूप से सुनिश्चित करना आवश्यक है; इसलिए इसे किसी निश्चित शारीरिक रूप का नाम बताने में सावधानी रखनी चाहिए। (१९) श्वदंष्ट्रा कुत्ते के समान दाँत अथवा दंष्ट्राओं वाली हैं। (२०) वानरानना वानर अर्थात् बन्दर के समान मुख वाली हैं। (२१) ऋक्षाक्षी ऋक्ष—भालू—से सम्बन्धित आँखों अथवा नेत्र-रूप वाली का संकेत देती हैं। (२२) केकराक्षी का सटीक अर्थ प्राचीन शब्द-प्रयोग और पाठ-परम्परा पर निर्भर है; इसे केवल आधुनिक शब्दार्थ से निर्णायक रूप से परिभाषित नहीं करना चाहिए। (२३) बृहत्तुण्डा बड़ी चोंच अथवा विशाल मुख वाली हैं। (२४) सुराप्रिया सुरा अर्थात् मदिरा से सम्बन्धित अथवा उसे प्रिय मानने वाली का अर्थ देती हैं; यह नाम तान्त्रिक परम्पराओं में वर्णित अनुष्ठानिक प्रतीकों के सन्दर्भ में भी विचारणीय है, पर अकेले नाम से किसी पूजा-पद्धति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

पच्चीसवीं से बत्तीसवीं योगिनी तक—(२५) कपालहस्ता हाथ में कपाल धारण करने वाली हैं। (२६) रक्ताक्षी लाल अथवा रक्तवर्ण नेत्रों वाली हैं। (२७) शुकी शुक अर्थात् तोते से सम्बद्ध स्त्री-रूप है। (२८) श्येनी श्येन अर्थात् बाज या शिकारी पक्षी से सम्बन्धित रूप है। (२९) कपोतिका कपोत अर्थात् कबूतर से सम्बद्ध आकृति है। (३०) पाशहस्ता हाथ में पाश धारण करने वाली हैं; पाश बन्धन, नियन्त्रण अथवा किसी शक्ति को वश में करने का प्रतीक हो सकता है। (३१) दण्डहस्ता हाथ में दण्ड धारण करने वाली हैं। (३२) प्रचण्डा चण्डविक्रमा अत्यन्त उग्र और प्रचण्ड पराक्रम वाली योगिनी का संयुक्त नाम है।

तैंतीसवीं से चालीसवीं योगिनी तक—(३३) शिशुघ्नी का शाब्दिक अर्थ शिशुओं का संहार करने वाली है। यह उग्र नाम पुराणिक तथा तान्त्रिक साहित्य में भयावह शक्तियों के वर्णन की शैली को दिखाता है; इसे किसी सामान्य उपासना में हिंसा का निर्देश नहीं मानना चाहिए। (३४) पापहन्त्री पाप का नाश करने वाली हैं। (३५) काली काल, समय, संहार और महाशक्ति से सम्बन्धित प्रसिद्ध देवी-रूप हैं। (३६) रुधिरपायिनी रक्तपान करने वाली का अर्थ देती हैं और उग्र देवी-प्रतिमाओं की प्रतीक-भाषा से जुड़ी हैं। (३७) वसाधया का पाठ तथा अर्थ स्पष्ट करने के लिए संस्कृत संस्करण और टीका की जाँच आवश्यक है; इसे बिना प्रमाण किसी निश्चित अर्थ में अनूदित नहीं करना चाहिए। (३८) गर्भभक्षा का शाब्दिक अर्थ गर्भ को भक्षण करने वाली है। यह अत्यन्त उग्र नाम है, जिसकी व्याख्या उसके धार्मिक और साहित्यिक प्रसंग में ही की जानी चाहिए। (३९) शवहस्ता हाथ में शव धारण करने वाली हैं। (४०) आन्त्रामालिनी आन्त्र अर्थात् आँतों की माला धारण करने वाली का अर्थ देती हैं; यह श्मशान और संहार से जुड़े उग्र प्रतीकों की ओर संकेत करता है।

इकतालीसवीं से अड़तालीसवीं योगिनी तक—(४१) स्थूलकेशी घने, भारी अथवा मोटे केशों वाली हैं। (४२) बृहद्कुक्षी विशाल उदर वाली हैं। (४३) सर्पास्या सर्प के समान मुख वाली हैं। (४४) प्रेतवाहना प्रेत को वाहन बनाने वाली अथवा प्रेत पर आरूढ़ होने वाली का अर्थ देती हैं। (४५) दण्डशूककरा का सम्बन्ध दण्डशूक—सर्प या विषधर प्राणी के लिए प्रयुक्त शब्द—से है; नाम का सटीक विग्रह पाठानुसार जाँचना चाहिए। (४६) क्रौञ्ची) क्रौञ्च नामक पक्षी से सम्बद्ध रूप है। (४७) मृगशीर्षा मृग के सिर अथवा मृग-सदृश सिर वाली हैं। (४८) वृषानना वृषभ अर्थात् बैल के समान मुख वाली हैं।

उनचासवीं से छप्पनवीं योगिनी तक—(४९) व्यात्तास्या पूरा खुला हुआ मुख रखने वाली हैं। (५०) धूमनिःश्वासा जिनकी श्वास धुएँ के समान है अथवा जिनसे धुएँ का निःश्वास निकलता है। (५१) व्योमैकचरणा आकाश में एक चरण से विचरण करने वाली अथवा आकाश से सम्बन्धित असाधारण गति वाली का संकेत करती हैं। (५२) ऊर्ध्वदृक् ऊपर की ओर दृष्टि रखने वाली हैं। (५३) तापनीदृष्टि ताप देने वाली अथवा दाहकारी दृष्टि वाली हैं। (५४) शोषणीदृष्टि सुखा देने वाली अथवा शोषण करने वाली दृष्टि वाली का अर्थ देती हैं। (५५) कोटरी कोटर, गुफा या खोखले स्थान से सम्बन्धित नाम है; कुछ संदर्भों में यह शरीर की गहरी अथवा खोखली आकृति का संकेत भी हो सकता है। (५६) स्थूलनासिका बड़ी अथवा मोटी नासिका वाली हैं।

सत्तावनवीं से चौंसठवीं योगिनी तक—(५७) विद्युत्प्रभा बिजली के समान चमक वाली हैं। (५८) बलाकास्या बलाका अर्थात् बगुले के समान मुख वाली हैं। (५९) मार्जारी बिल्ली से सम्बन्धित स्त्री-रूप है। (६०) कटपूतना एक उग्र नाम है; ‘पूतना’ भारतीय पौराणिक परम्परा में विशिष्ट राक्षसी-रूप से भी जुड़ा है, लेकिन इस नाम का सटीक अर्थ और पहचान पाठ-सन्दर्भ से ही निर्धारित की जानी चाहिए। (६१) अट्टाट्टहासा प्रचण्ड, गूँजती अथवा अट्टहास करती हुई का अर्थ देती हैं। (६२) कामाक्षी मनोहर अथवा कामना से सम्बन्धित नेत्रों वाली देवी का प्रसिद्ध नाम है; कामाक्षी की स्वतंत्र और व्यापक देवी-परम्परा भी है। (६३) मृगाक्षी मृग के समान नेत्रों वाली हैं। (६४) मृगलोचना मृग-सदृश लोचन वाली हैं। मृगाक्षी और मृगलोचना जैसे नाम सौम्य सौन्दर्य की छवि प्रस्तुत करते हैं, जबकि इसी सूची में कपाल, प्रेत, रक्त और विकराल रूपों के नाम भी हैं। यही विविधता योगिनी-परम्परा की एक विशिष्ट विशेषता है।

 

अग्निपुराण और कालिकापुराण की परम्परा में योगिनियाँ

अग्निपुराण के अध्याय ५२ में योगिनियों की मूर्ति-कल्पना और दिशाओं से सम्बन्धित समूहों का वर्णन मिलता है। यहाँ योगिनियों को दुर्गा की शक्तियों अथवा परिचारिकाओं के रूप में प्रस्तुत करने वाली परम्परा दिखाई देती है। इस अध्याय में अक्षोभ्या, रूक्षकर्णी, राक्षसी, कृपणा, पिङ्गाक्षी, क्षया, क्षेमा, इला, लीला, लया, लक्ता, बालाकेशी, लालसा, विमला, हुता‍शा, विशालाक्षी, हुंकारा, वडवामुखी, महाक्रूरा, क्रोधना, भयंकरा, महानना, सर्वज्ञा, तारा, ऋग्वेदा, हयानना, रक्ताक्षी, सुप्रसिद्धा, विद्युत्जिह्वा, करङ्किणी, मेघनादा, प्रचण्डोग्रा और वरप्रदा जैसे नाम मिलते हैं। यह सूची स्कन्दपुराण की काशीखण्ड वाली सूची से भिन्न है। अग्निपुराण की नामावली में दिशाओं के अनुसार वर्गीकरण और देवियों के रूपों की मूर्तिकला-सम्बन्धी विशेषताएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं।

कालिकापुराण में योगिनियों की चर्चा देवी, मातृका और तान्त्रिक शक्ति-उपासना के व्यापक प्रसंग में आती है। इसके अध्याय ६२–६३ में देवी के उग्र रूपों तथा योगिनियों के नामों का उल्लेख मिलता है। इस परम्परा से सम्बद्ध नामावली में कामेश्वरी, गुप्तदुर्गा, विन्ध्यकन्दरवासिनी, कोटेश्वरी, दीर्घिका, प्रकटि, भुवनेश्वरी, आकाशगंगा, कामाख्या, दिक्करवासिनी, मातंगी, ललिता, दुर्गा, भैरवी, सिद्धिदा, बलप्रमथिनी, चण्डी, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, उग्रा, भीमा, शिवा, शान्ता, जयन्ती, कालिका, मंगला और भद्रकाली जैसे नाम उद्धृत किए जाते हैं। किन्तु इस नामावली को स्कन्दपुराण के सभी चौंसठ नामों के साथ मिलाकर एक नई संयुक्त सूची बनाना उचित नहीं होगा। कालिकापुराण के नामों को उसके संस्कृत पाठ और सम्बन्धित अध्याय से मिलाकर ही उद्धृत करना चाहिए; अलग-अलग संस्करणों में अध्याय और पाठ-संख्या की जाँच भी आवश्यक है।

इन तीनों पुराणों की तुलना से एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है: ‘चौंसठ योगिनियाँ’ एक व्यापक धार्मिक अवधारणा है, लेकिन उनकी नामावली, वर्गीकरण और प्रत्येक देवी का स्वरूप सभी ग्रन्थों में समान नहीं है। अतः यदि कोई व्यक्ति किसी एक सूची को ही सभी परम्पराओं की अंतिम और सार्वभौमिक सूची बताता है, तो उस दावे की जाँच मूल ग्रन्थ से करनी चाहिए।

मन्त्र-परम्परा

स्कन्दपुराण, काशीखण्ड, अध्याय ४५ के श्लोक ३३–४१ में योगिनियों के नामों का उल्लेख आता है। इस प्रसंग में स्कन्द ऋषि अगस्त्य को योगिनियों के नाम बताते हैं। मूल संस्कृत पाठ के आधार पर नामों का उच्चारण और पाठ-शुद्धि महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर उन नामों में जिनके अर्थ आज की प्रचलित संस्कृत से सीधे स्पष्ट नहीं होते। किसी ऑनलाइन सूची में नामों की वर्तनी, क्रम या संधि भिन्न हो तो उसे स्वतः प्रमाण नहीं मानना चाहिए।

सामान्य भक्तिपरक नमस्कार के रूप में “ॐ चतुःषष्टियोगिनीभ्यो नमः॥” कहा जा सकता है। इसका अर्थ है—“चौंसठ योगिनियों को नमस्कार।” यह एक सरल सामूहिक नमस्कार-वाक्य है; इसे बिना प्रमाण स्कन्दपुराण, अग्निपुराण या कालिकापुराण का विशिष्ट मूल मन्त्र बताना उचित नहीं होगा। इसी प्रकार ऐं, ह्रीं, श्रीं और क्रीं जैसे बीजाक्षर विभिन्न देवी-उपासना परम्पराओं में प्रयुक्त होते हैं, लेकिन प्रत्येक योगिनी का अलग बीजमन्त्र, न्यास, ध्यान या अनुष्ठान-विधान बताने के लिए सम्बन्धित तन्त्र का स्पष्ट पाठ आवश्यक है। तान्त्रिक मन्त्र-साधना में परम्परा, गुरु-निर्देश और विधि का महत्त्व होता है; इसलिए किसी अप्रमाणित इंटरनेट-सूची को शास्त्रीय विधान का विकल्प नहीं समझना चाहिए।

योगिनी-उपासना का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व

चौंसठ योगिनियों की परम्परा हमें भारतीय धार्मिक कल्पना की उस व्यापकता से परिचित कराती है जिसमें दिव्यता केवल कोमल, सुन्दर और परिचित रूपों तक सीमित नहीं रहती। यहाँ देवी कभी मृगनयनी और विद्युत्प्रभा हैं, तो कभी कपालहस्ता, प्रेतवाहना अथवा रुधिरपायिनी। ये भिन्न रूप उस धार्मिक संसार का हिस्सा हैं जिसमें भय, मृत्यु, परिवर्तन, संरक्षण, शक्ति और मुक्ति के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कुछ नामों का सम्बन्ध प्रकृति और पशु-पक्षियों से है, कुछ का असाधारण शारीरिक आकृतियों से, और कुछ का पाप-नाश, तेज अथवा उग्र शक्ति से। इन रूपों को समझने में भाषिक व्युत्पत्ति उपयोगी है, लेकिन किसी योगिनी का सम्पूर्ण धार्मिक अर्थ उसके नाम से ही निर्धारित नहीं हो सकता।

योगिनी-मन्दिरों की स्थापत्य-परम्परा भी इस विषय को केवल ग्रन्थों तक सीमित नहीं रहने देती। हिरापुर, रानीपुर-झरियाल, भेड़ाघाट और मितावली जैसे स्थलों पर उपलब्ध स्थापत्य और मूर्तिकला इस परम्परा के ऐतिहासिक अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इन स्थलों की मूर्तियों, उनकी स्थिति, प्रतीकों और निर्माण-काल का अध्ययन करने से यह समझने में सहायता मिलती है कि विभिन्न क्षेत्रों में योगिनी-सम्बन्धी धार्मिक धारणाएँ किस प्रकार व्यक्त हुईं। फिर भी किसी विशेष मन्दिर की प्रत्येक मूर्ति का नाम, उसकी पूजा-पद्धति या उसका सम्बन्ध किसी पुराण की सूची से तभी निश्चित करना चाहिए जब उसके समर्थन में अभिलेखीय, पुरातात्त्विक अथवा पाठीय प्रमाण उपलब्ध हों।

अन्ततः चौंसठ योगिनियों का अध्ययन केवल नाम याद करने या मन्त्रों का संकलन करने तक सीमित नहीं है। यह भारतीय शक्ति-परम्परा, पुराण-साहित्य, तन्त्र, स्थापत्य, मूर्तिकला और धार्मिक विचारों के परस्पर सम्बन्धों को समझने का अवसर देता है। स्कन्दपुराण की काशीखण्ड वाली नामावली, अग्निपुराण की दिशाओं और मूर्ति-लक्षणों से सम्बन्धित परम्परा तथा कालिकापुराण का देवी-प्रधान प्रसंग—तीनों को उनके अपने पाठ-सन्दर्भ में पढ़ना ही इस विषय के प्रति सबसे अधिक प्रामाणिक दृष्टिकोण है।

समापन में, चौंसठ योगिनियों की परम्परा भारतीय आध्यात्मिक इतिहास का ऐसा विषय है जिसमें रहस्य और श्रद्धा के साथ-साथ पाठ-शुद्धता और ऐतिहासिक सावधानी भी आवश्यक है। विभिन्न पुराणों में नामों का अन्तर इस परम्परा की कमजोरी नहीं, बल्कि उसके क्षेत्रीय, धार्मिक और तान्त्रिक विकास की विविधता का संकेत है। मूल ग्रन्थों को उनके अपने सन्दर्भ में पढ़ने से ही योगिनियों के स्वरूप और उनके आध्यात्मिक महत्त्व को अधिक प्रामाणिक ढंग से समझा जा सकता है।

सन्दर्भ

1. स्कन्दपुराण, काशीखण्ड, पूर्वार्ध, अध्याय ४५, विशेषतः श्लोक ३३–४१

2. अग्निपुराण, अध्याय ५२ 

3. कालिकापुराण, अध्याय ६२–६३