Zen

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Tuesday, 28 July 2026

हम बीज हैं दबाओ उतना उगेंगे

सड़कों पर बिखरी वे टूटी हुई चूड़ियाँ

और किताबों पर छिटके लहू के कतरे,

किसी मामूली टकराव के गवाह नहीं हैं।

 

वे प्रमाण हैं उस व्यवस्था के क्रूर इरादों के,

जो चेतना के हर अंकुर को

अपने लोहे के जूतों तले मसल देना चाहती है।

यहाँ संवाद एक अपराध है,

और प्रश्न राजद्रोह!

 

सच्चाई को 'अराष्ट्रीय' के सांचे में ढालकर

सलाखों के पीछे सुखा दिया जाता है।

काल की उस स्याह ढलती शाम से

इस गणतंत्र की आत्मा पर एक ऐसा शिकंजा कसा है,

जहाँ …

साँस लेना भी बहुत ही कठिन हो रहा है।

 

वह रूपहला परदा (सिनेमा), जो कभी समाज का दर्पण था,

अब रीढ़विहीन, गूंगा और रीता हो चुका है;

वे अब सत्ता के गलियारों में घुटनों के बल रेंगते हैं।

 

और डिजिटल अंधेरों से निकलने वाली वह पालतू ट्रोल-सेना,

हर तर्क, हर न्यायसंगत चीख पर

नफ़रत भरी कीचड़ की बौछार कर देती है।

यह मेरा वह भारत तो कतई नहीं है,

जिसे पुरखों ने अपनी कुर्बानियों से सींचा था।

इसे तो स्वार्थी सियासतदानों और रीढ़विहीन नौकरशाहों के

गठबंधन ने एक मरुस्थल में बदल दिया है।

वे सोचते हैं कि उन्होंने वजूद को ही मिटा दिया,

पर वे भूल गए—हम बीज हैं,

जितना गहरा दफनाओगे, उतने ही प्रचंड वेग से दोबारा उगेंगे।

 

 - डॉ. इन्ताज़ मलेक