Zen

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Sunday, 11 October 2026

Acharya Hirvijaysuri and Emperor Akbar


When Spiritual Wisdom Transformed Imperial Power

Dr Intaj Malek

There are no sources in the current document.

The encounter between the illustrious Jain Acharya Hirvijaysuri and Emperor Akbar stands as a remarkable testament to the power of spiritual wisdom, religious tolerance and compassion in Indian history.

Among India's sovereigns renowned for benevolence and religious forbearance, Akbar occupies a distinguished place. In The Great Emperor Akbar, Bankimchandra Lahiri cites Swami Ramatirtha, who portrays the emperor in these memorable words:

“The countenance of Emperor Akbar remained radiant like a flower in spring; a gentle smile, expressive of his gracious disposition, seemed perpetually to adorn his lips. And why should such cheerfulness not have been his? Where universal love and devotion to God reside, what power has anger to approach?”

At Akbar's invitation, Acharya Hirvijaysuri arrived at Fatehpur Sikri in 1582 CE. Their encounter transcended the conventional boundaries between monk and monarch. Through his profound erudition, ascetic discipline and teachings of Ahimsa (nonviolence), compassion and reverence for every living being, the Acharya is credited with awakening Akbar's deeper appreciation of Jain principles.

Tradition records that Akbar honoured the Jain community's sacred sites, renounced meat-eating and issued prohibitions against animal slaughter during Paryushana and for a period thereafter. He is also remembered for measures intended to protect religious establishments and promote peaceful coexistence.

The literary testimony is equally significant. Shri Padmasagar Gani's Jagadguru Kavya, Shri Devvimal Gani's Hir-Saubhagya Mahakavya and Shri Vimaldev Gani's Siddha-Saubhagya preserve vivid accounts of the Acharya's influence and the emperor's esteem. Following learned religious discussions, Akbar bestowed upon Hirvijaysuri the revered title “Jagadguru”-Preceptor of the World.

Bhikshu Akhandanand praised Bankimchandra Lahiri's historical scholarship for presenting Akbar's merits and rebutting allegations against him with reasoned arguments and historical references. Jain and non-Jain scholars, saints and litterateurs across generations have likewise recognised the significance of Akbar's legacy.

At a time when history is sometimes obscured by prejudice and partisan passions, these testimonies invite us to approach the past with intellectual honesty and impartiality. Akbar's encounter with Hirvijaysuri reminds us that true greatness is measured not merely by the extent of an empire, but by the capacity to listen, to learn and to respect the lives and beliefs of others.

The highest triumph of religion lies not in defeating another, but in transforming the human heart.

Lahidi, Bankimchandra. Mahan Samrat Akbar. Ed. Bhikshu Akhandanand. Trans. Gujarati Translator Bhimji Harjivan Parikh. Ahmedabad and Mumbai: Sastu Sahitya Vardhak Karyalaya, V.S. 1981. Print.

ગણિ, દેવવિમલ. હીર સૌભાગ્ય મહાકાવ્ય. Trans. સાધ્વી સુલોચનાજી. Vols. 1-2. અમદાવાદ: અક્ષર પ્રેસ, n.d. પ્રિન્ટ.

નરવાહનસૂરિ, પરમ પૂજ્ય આચાર્ય. અકબર પ્રતિબોધક હીરવિજય સૂરિ. અમદાવાદ : પદાર્થ દર્શન ટ્રસ્ટ અમદાવાદ , 2005 .

 



Monday, 21 September 2026

बातूनी यांको


किसी समय की बात है। दूर-दूर तक फैली हरी-भरी घास की ढलानों और लहरदार पहाड़ियों के बीच एक छोटा-सा रमणीय गाँव बसा था। वहाँ के लोग सरल थे, जीवन शांत था और दिन अपनी सहज गति से बीतते थे। उसी गाँव में यांको नाम का एक भोला-भाला आदमी रहता था।

यांको की एक विचित्र आदत थी—वह बहुत बोलता था।

इतना कि यदि कोई उससे रास्ते में कुशल-क्षेम पूछ ले, तो वह उस छोटे-से प्रश्न का उत्तर देते-देते न जाने कितनी बातें सुना डालता। गाँव का कोई व्यक्ति, कोई घटना, कोई छोटी-सी बात—कुछ भी उसकी वाचालता से अछूता नहीं रहता था। हर विषय पर उसकी अपनी राय थी और हर व्यक्ति के बारे में कहने को उसके पास कुछ न कुछ अवश्य होता।

उसके शब्दों पर मानो कोई बाँध ही नहीं था। वे एक ऐसी नदी की तरह बहते रहते, जो यह सोचे बिना अपना रास्ता बनाती चली जाए कि उसकी धारा से किनारे की मिट्टी कट रही है या किसी का घर उजड़ रहा है।

एक दिन की बात है। दोपहर का समय था। आकाश निर्मल था और गाँव पर एक शांत, सुस्त-सी धूप पसरी हुई थी। यांको अपने मित्र नांको से मिलने निकला। नांको कुछ दिन पहले एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना का शिकार हो गया था और बिस्तर पर पड़ा था।

यांको उसके घर पहुँचा। भीतर प्रवेश करते ही उसने अपने मित्र का हाल पूछना शुरू किया और उसी के साथ उसकी बातों की धारा भी बह निकली।

वह बोलता गया—लगातार, निर्बाध, बिना यह देखे कि सामने वाला सुन भी रहा है या नहीं।

नांको के बिस्तर के पास एक और ग्रामीण बैठा था—टांको। मगर यांको की आँखों ने उसे देखा ही नहीं, या यूँ कहिए कि उसकी अपनी आवाज़ ने उसकी दृष्टि पर भी परदा डाल रखा था।

वह गाँव की बातें करता रहा, लोगों की बातें करता रहा, छोटी-बड़ी घटनाओं को अपने ढंग से जोड़ता और उनका अर्थ निकालता रहा। फिर अचानक उसकी बातों का रुख एक ऐसे नाम की ओर मुड़ गया, जिसने जैसे उसके भीतर एक नई कहानी जगा दी हो—

“इांको...”

बस, फिर क्या था!

यांको ने इांको के बारे में बोलना शुरू कर दिया।

कौन था इांको? उसने क्या किया था? कैसा आदमी था? उसके स्वभाव में क्या-क्या बातें थीं? यांको को स्वयं शायद इनमें से किसी बात का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं था। लेकिन जहाँ ज्ञान समाप्त होता था, वहाँ उसकी कल्पना शुरू हो जाती थी। उसने कुछ सुनी-सुनाई बातों में अपनी कल्पना मिलाई, कुछ बातों को बढ़ाया और कुछ को ऐसा रंग दे दिया, मानो वह स्वयं उन घटनाओं का साक्षी रहा हो।

नांको और टांको एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

उनकी आँखों में आश्चर्य था—और शायद कुछ अविश्वास भी।

मगर यांको को इसकी कोई खबर नहीं थी। वह अपनी ही बातों में इतना डूबा हुआ था कि सामने बैठे लोगों के चेहरों पर लिखी प्रतिक्रिया तक उसे दिखाई नहीं दे रही थी।

उस दिन कही गई बातें वहीं समाप्त नहीं हुईं।

वे यांको के साथ घर से बाहर निकलीं।

किसी ने उन्हें सुना, फिर किसी और को सुनाया। किसी ने उसमें अपनी ओर से एक बात जोड़ दी, किसी ने किसी दूसरी बात को और बड़ा बना दिया। इस तरह एक साधारण-सी बातचीत धीरे-धीरे अफ़वाह में बदल गई।

और देखते ही देखते इांको का नाम गाँव की चर्चाओं में आने लगा।

यांको की लापरवाह ज़बान ने जिन बातों को बिना सोचे कह दिया था, उन्होंने इांको की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचानी शुरू कर दी। उसके बारे में ऐसी धारणाएँ बनने लगीं, जिनका वास्तविकता से शायद कोई संबंध ही नहीं था।

शब्द हवा में घुलते हुए दिखाई नहीं देते, लेकिन कभी-कभी वे हवा से भी तेज़ यात्रा करते हैं।

एक बार मुँह से निकला हुआ शब्द लौटकर नहीं आता। वह किसी के कान तक पहुँचता है, फिर किसी और की ज़ुबान पर चढ़ता है और अंततः किसी ऐसे हृदय को घायल कर सकता है, जिसने उसके जन्म की कोई गलती नहीं की।

इांको को जब इन बातों का पता चला, तब भी उसने यांको का सामना नहीं किया।

न उसने कोई शिकायत की, न कोई सफ़ाई दी, न क्रोध में कोई कठोर शब्द कहा।

उसने मौन को अपना उत्तर बना लिया।

शायद उसे लगा कि कुछ बातें समझाने से नहीं, समय के साथ ही शांत होती हैं।

लेकिन यांको?

वह वैसा ही रहा।

उसे अपनी बातों की गंभीरता का तनिक भी एहसास नहीं हुआ। वह यह समझ ही नहीं पाया कि उसके लिए जो केवल बातचीत थी, वह किसी दूसरे के लिए अपमान, पीड़ा और बदनामी का कारण बन सकती है।

गाँव की शांति अब फुसफुसाहटों में बदलने लगी थी।

जहाँ कभी लोग सहजता से मिलते-जुलते थे, वहाँ अब किसी के पीछे धीमी आवाज़ में बातें होने लगीं। यांको की कही बातों ने जैसे एक अदृश्य जाल बुन दिया था, जिसमें गाँव का वातावरण उलझता चला गया।

और उस पूरे घटनाक्रम के बीच इांको चुप रहा।

वह सब सुनता रहा, सहता रहा और अपने सम्मान पर लगे दाग को मौन की गरिमा के साथ ढोता रहा।

उधर यांको अपनी पुरानी दुनिया में मग्न था।

उसके लिए शब्द अब भी केवल शब्द थे—बिना किसी पहरे के निकलते हुए, एक-दूसरे के पीछे भागते हुए, हवा में बिखरते हुए।

उसे यह एहसास नहीं था कि शब्दों की भी अपनी नियति होती है।

कुछ शब्द किसी टूटे हुए मन को सहारा देते हैं।

कुछ शब्द किसी चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं।

और कुछ शब्द—बिना किसी बुरे इरादे के भी—किसी के जीवन पर ऐसा निशान छोड़ जाते हैं, जिसे मिटने में वर्षों लग सकते हैं।

यांको की दुनिया में बोलना सहज था, लेकिन चुप रहना कठिन।

वह हर बात पर कुछ कहना चाहता था, मगर कभी यह सोचने के लिए नहीं ठहरता था कि उसे कहना चाहिए भी या नहीं।

वह यह नहीं समझ पाया कि बुद्धिमानी केवल यह जानने में नहीं है कि क्या कहना है; कभी-कभी बुद्धिमानी यह जानने में भी होती है कि कब चुप रहना है।

जीवन उसके सामने बार-बार यह पाठ रखता रहा, लेकिन यांको अपनी ही बातों की अंतहीन धारा में बहता रहा।

उसके शब्द निकलते रहे...

और उनके निशान दूसरों के जीवन पर पड़ते रहे।

शायद यांको सचमुच बुरा आदमी नहीं था।

उसकी सबसे बड़ी भूल यही थी कि वह अपने शब्दों को कभी गंभीरता से नहीं लेता था।

उसे मालूम ही नहीं था कि बिना सोचे बोले गए शब्द भी किसी के सम्मान को घायल कर सकते हैं, किसी की छवि को धूमिल कर सकते हैं और किसी शांत जीवन में अनचाहा तूफ़ान ला सकते हैं।

और इस तरह वह अपनी ही बातों की दुनिया में खोया रहा—एक ऐसी अंतहीन धारा में, जिसमें शब्द तो बहुत थे, मगर उनके परिणामों के बारे में सोचने का समय कभी नहीं था।

क्योंकि शब्द हवा में विलीन हो जाएँ, ऐसा आवश्यक नहीं।
कभी-कभी वे किसी के हृदय में उतर जाते हैं—और वहीं रह जाते हैं।

— डॉ. इंताज मलेक 

Sunday, 20 September 2026

पहली नज़र

तुम मेरे जीवन में
किसी आकस्मिक घटना की तरह नहीं आए
न कोई उद्घोष था,
न कोई ऐसा कोलाहल
जिसने तुम्हारे आगमन की घोषणा की हो।

तुम्हारा आना तो
एक मौन परिवर्तन था
मानो समूचा संसार
धीरेधीरे अपनी धुरी पर
कुछ इस प्रकार पुनः संतुलित हो रहा हो
कि उसे केवल
मेरे भीतर का सबसे सजग,
सबसे संवेदनशील अंश ही
पहचान सका।

सब कुछ आरम्भ हुआ
एक दृष्टि से।

वह क्षणिक दृष्टि नहीं थी,
बल्कि उतनी देर तक ठहरी हुई
कि बिना शब्दों के ही
यह संकेत दे सके
कि हमारे बीच
कुछ अनकहा स्वीकार लिया गया है।

उस एक क्षण में
संसार अपनी गति से चलता रहा
लोग आतेजाते रहे,
समय अपनी धारा में बहता रहा,
जीवन का परिचित कोलाहल
वैसा ही बना रहा—

किन्तु मेरे भीतर
कुछ बदल चुका था।

वह केवल आकर्षण नहीं था;
वह तो पहचान थी—
मानो मेरे अस्तित्व का कोई अंश
बहुत पहले से
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था।

न सचेत रूप से,
न किसी संकल्प के साथ,
बल्कि उस गहरे,
बहुत प्राचीन अंतराल में
जहाँ आकांक्षाएँ जन्म लेती हैं
उससे भी पहले
कि उन्हें भाषा मिल सके।

तुम वहाँ खड़े थे
न स्वयं पर किसी का ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा,
न अपने होने के अतिरिक्त
कुछ और देने का प्रयास।

फिर भी,
तुम्हारी उस शांत उपस्थिति में
एक अद्भुत गुरुत्व था,
जिसने बिना किसी प्रतिरोध के
मुझे अपनी ओर खींच लिया।

और उसी क्षण
मैंने वह सत्य जाना
जिसे केवल अनुभवों से नहीं सीखा जा सकता।

जीवन की कुछ मुलाकातें
हमारे जीवन में इसलिए नहीं आतीं
कि उनका अर्थ समझाया जा सके;

वे आती हैं
केवल अनुभव की जाने के लिए,
स्मृतियों में अमर हो जाने के लिए,

और बहुत शांत,
बहुत निस्संग ढंग से
हमारे भीतर ही भीतर
हमें रूपांतरित करने की प्रक्रिया
आरम्भ कर देने के लिए।

 हर सुबह,

लगभग एक ही समय पर,

दो शब्द आ जाया करते थे,               

Good Morning

मानो कोई नन्ही चिड़िया

अपने घर लौट आई हो

 दुनिया के लिए

वे साधारण शब्द थे।

 पर किसी प्रतीक्षारत दिल के लिए,

वे धूप भी थे
और छाँव भी।

चार साल बीत गए थे

जब स्पर्श ने वहाँ बातें की थीं,
जहाँ शब्द पहुँच न पाए थे।

 चार साल...

व्यस्तताओं के
परिवार की ज़िम्मेदारियों के,
व्यापार की पुकारों के,
समारोहों के,
कर्तव्यों के,
और टलते चले गए वादों के।

फिर भी,

एक भी सुबह ऐसी नहीं आई
जिसमें वह अभिवादन अनुपस्थित रहा हो।

भेजने वाला प्रेम करता था।

पाने वाला यह जानता था।

प्रेम जीवित है

उस नियमित आगमन में,
उन साधारण-सी प्रतीत होने वाली चिन्ताओं में,
भोर से पहले भेजे गए संदेशों में,
और आधी रात के बाद बाँटे गए विचारों में।

किन्तु एक हृदय
अनेक संसारों का था

परिवार का,
दायित्वों का,
प्रतिष्ठा का,
कर्तव्य का

और कहीं बहुत भीतर,
सावधानी से सँजोए हुए
एक अद्वितीय प्रेम का।

दूसरा हृदय

लगभग सम्पूर्ण रूप से
उसी प्रेम का था।

बस, यही अन्तर था।

जब भी मिलन निकट प्रतीत हुआ,

संसार बीच में आ खड़ा हुआ

कभी कोई पारिवारिक आयोजन,
कभी कोई आकस्मिक दायित्व,
कभी कोई ऐसी ज़िम्मेदारी
जिसे टाला न जा सके।

क्षमायाचनाएँ आती।

और उनके पीछे
क्षमा भी।

प्रेम और कर भी क्या सकता था?

एक सुबह,

उस परिचित अभिवादन को पढ़कर
मन में एक उत्तर आकार लेने लगा

"कितना सुन्दर है यह जानना
कि उस सूर्योदय में भी
मुझे स्मरण किया जाता है,
जो किसी और के आँगन का है।"

शब्द कुछ देर ठहरे।

फिर खो गए। 

और उनकी जगह आया
एक सरल उत्तर

"Good morning"

कुछ ही क्षणों बाद,

परदे पर एक छोटा-सा हृदय उभर आया।

 और कुछ नहीं।

न आलिंगन

न चुराई हुई कोई दोपहर या शाम।

न प्रतीक्षा की पूर्णता।

केवल एक छोटा-सा लाल प्रतिक,

जो दो अलग-अलग संसारों के बीच
मौन प्रकाश-सा
टिमटिमा रहा था।

और फिर भी,

उस एक क्षण के लिए,

वह पर्याप्त था।

क्योंकि कभी-कभी प्रेम

उससे जीवित नहीं रहता
जो उसे प्राप्त होता है,

बल्कि उस विश्वास से

कि संसार के असंख्य कर्तव्यों के बीच भी,

कहीं कोई है,

जो हर सुबह

अब भी

उसे याद करता है।

 

~ डॉ. इंताज़ मलेक