Zen

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Tuesday, 23 June 2026

किसी और के आँगन का सूर्योदय


हर सुबह,

लगभग एक ही समय पर,

दो शब्द आ जाया करते थे,
मानो कोई नन्ही चिड़िया

अपने घर लौट आई हो—

Good Morning

दुनिया के लिए
वे साधारण शब्द थे।

पर किसी प्रतीक्षारत दिल के लिए,
वे धूप भी थे
और छाँव भी।

चार वर्ष बीत गए थे—

जब स्पर्श ने वहाँ बातें की थीं,
जहाँ शब्द पहुँच न पाए थे।

चार वर्ष—

व्यस्तताओं के,
परिवार की ज़िम्मेदारियों के,
व्यापार की पुकारों के,
समारोहों के,
कर्तव्यों के,
और टलते चले गए वादों के।

 

फिर भी,

एक भी सुबह ऐसी नहीं आई
जिसमें वह अभिवादन अनुपस्थित रहा हो।

भेजने वाला प्रेम करता था।

पाने वाला यह जानता था।

प्रेम जीवित है —

उस नियमित आगमन में,
उन साधारण-सी प्रतीत होने वाली चिन्ताओं में,
भोर से पहले भेजे गए संदेशों में,
और आधी रात के बाद बाँटे गए विचारों में।

किन्तु एक हृदय
अनेक संसारों का था—

परिवार का,
दायित्वों का,
प्रतिष्ठा का,
कर्तव्य का—

और कहीं बहुत भीतर,
सावधानी से सँजोए हुए
एक गुप्त प्रेम का।

 

दूसरा हृदय

लगभग सम्पूर्ण रूप से
उसी प्रेम का था।

बस, यही अन्तर था।

 

जब भी मिलन निकट प्रतीत हुआ,

संसार बीच में आ खड़ा हुआ—

कभी कोई पारिवारिक आयोजन,
कभी कोई आकस्मिक दायित्व,
कभी कोई ऐसी ज़िम्मेदारी
जिसे टाला न जा सके।

क्षमायाचनाएँ आती।

और उनके पीछे
क्षमा भी।

प्रेम और कर भी क्या सकता था?

 

एक सुबह,

उस परिचित अभिवादन को पढ़कर
मन में एक उत्तर आकार लेने लगा—

"कितना सुन्दर है यह जानना
कि उस सूर्योदय में भी
मुझे स्मरण किया जाता है,
जो किसी और के आँगन का है।"

शब्द कुछ देर ठहरे।

फिर खो गए।

और उनकी जगह आया
एक सरल उत्तर—

"सुप्रभात।"

कुछ ही क्षणों बाद,

परदे पर एक छोटा-सा हृदय उभर आया।

और कुछ नहीं।

न आलिंगन।

न चुराई हुई कोई दोपहर या शाम।

न प्रतीक्षा की पूर्णता।

केवल एक छोटा-सा लाल प्रतिक,

जो दो अलग-अलग संसारों के बीच
मौन प्रकाश-सा
टिमटिमा रहा था।

और फिर भी—

उस एक क्षण के लिए,

वह पर्याप्त था।

क्योंकि कभी-कभी प्रेम
उससे जीवित नहीं रहता
जो उसे प्राप्त होता है,

बल्कि उस विश्वास से—

कि संसार के असंख्य कर्तव्यों के बीच भी,

कहीं कोई है,

जो हर सुबह

अब भी

उसे याद करता है।


~ डॉ. इंताज़ मलेक 

 

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