Zen

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Wednesday, 9 September 2026

कोई नाम नहीं दूँगा

तुमसे मिलने के बाद

मैंने जाना

कभी-कभी किसी व्यक्ति का आना

जीवन में घटना नहीं,

एक अर्थ का जन्म होता है।

 

तुम्हारे साथ

मैंने अपने भीतर का वह हिस्सा देखा

जिसे दुनिया ने

चुप रहना सिखा दिया था।

 

तुम्हारे सामने

मुझे कुछ छिपाना नहीं पड़ा-

न अपनी ख़ामोशी,

न अपनी बेचैनी,

न वह अनाम-सी चाह

जो शब्दों से पहले जन्म लेती है।

 

लोग पूछेंगे

यह रिश्ता क्या है?”

मैं शायद उत्तर न दूँ।

 

हर सत्य को

समाज की शब्दावली में

अनुवाद करना ज़रूरी नहीं।

 

कुछ रिश्ते

काग़ज़ पर नहीं लिखे जाते,

फिर भी जीवन की सबसे सच्ची पंक्ति

वही बन जाते हैं।

 

मुझे तुम्हें

किसी रिश्ते के नाम में बाँधना नहीं-

मैं तो बस इतना चाहता हूँ

कि मेरे होने में

तुम्हारा होना

अजनबी न लगे।

 

समय बहुत कम है,

इतना कम

कि शायद हमारे हिस्से में

पूरी कहानी भी न आए।

 

तो फिर क्यों न

जो कुछ शेष है

उसे आधा ही सही

मगर जी भर के जी लें

 

जो कहना है,

आँखों में कह दें।

 

जो महसूस करना है,

मौन में महसूस कर लें।

 

और जो दूरी

दुनिया ने हमारे बीच रख दी है,

उसे कम-से-कम

अपने भीतर तो मिटा दें।

 

कल इतिहास हमें

जो चाहे  वोह नाम दे

मुझे कोई शिकायत नहीं।

 

मैं बस चाहता हूँ

जब कभी मेरे जीवन को

अंदर से पढ़ा जाए,

 

तो एक पन्ने पर

तुम्हारा नाम न भी लिखा हो,

पर यह अवश्य लिखा मिले

की

यहाँ किसी ने

किसी को पूरी सच्चाई से चाहा था।

 

     ~ डॉ इन्ताज मलेक

पहली नज़र

तुम मेरे जीवन में
किसी आकस्मिक घटना की तरह नहीं आए
न कोई उद्घोष था,
न कोई ऐसा कोलाहल
जिसने तुम्हारे आगमन की घोषणा की हो।

तुम्हारा आना तो
एक मौन परिवर्तन था
मानो समूचा संसार
धीरेधीरे अपनी धुरी पर
कुछ इस प्रकार पुनः संतुलित हो रहा हो
कि उसे केवल
मेरे भीतर का सबसे सजग,
सबसे संवेदनशील अंश ही
पहचान सका।

सब कुछ आरम्भ हुआ
एक दृष्टि से।

वह क्षणिक दृष्टि नहीं थी,
बल्कि उतनी देर तक ठहरी हुई
कि बिना शब्दों के ही
यह संकेत दे सके
कि हमारे बीच
कुछ अनकहा स्वीकार लिया गया है।

उस एक क्षण में
संसार अपनी गति से चलता रहा
लोग आतेजाते रहे,
समय अपनी धारा में बहता रहा,
जीवन का परिचित कोलाहल
वैसा ही बना रहा

किन्तु मेरे भीतर
कुछ बदल चुका था।

वह केवल आकर्षण नहीं था;
वह तो पहचान थी
मानो मेरे अस्तित्व का कोई अंश
बहुत पहले से
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था।

न सचेत रूप से,
न किसी संकल्प के साथ,
बल्कि उस गहरे,
बहुत प्राचीन अंतराल में
जहाँ आकांक्षाएँ जन्म लेती हैं
उससे भी पहले
कि उन्हें भाषा मिल सके।

तुम वहाँ खड़े थे
न स्वयं पर किसी का ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा,
न अपने होने के अतिरिक्त
कुछ और देने का प्रयास।

फिर भी,
तुम्हारी उस शांत उपस्थिति में
एक अद्भुत गुरुत्व था,
जिसने बिना किसी प्रतिरोध के
मुझे अपनी ओर खींच लिया।

और उसी क्षण
मैंने वह सत्य जाना
जिसे केवल अनुभवों से नहीं सीखा जा सकता।

जीवन की कुछ मुलाकातें
हमारे जीवन में इसलिए नहीं आतीं
कि उनका अर्थ समझाया जा सके;

वे आती हैं
केवल अनुभव की जाने के लिए,
स्मृतियों में अमर हो जाने के लिए,

और बहुत शांत,
बहुत निस्संग ढंग से
हमारे भीतर ही भीतर
हमें रूपांतरित करने की प्रक्रिया
आरम्भ कर देने के लिए।

~ डॉ इन्ताज़ मलेक 

The First Glance

You did not arrive as a sudden event
there was no declaration,
no disruption that announced your presence.

Instead, it was subtle
like a quiet recalibration of the world
that only the most attentive part of me
was able to recognize.

It began with a glance,
Not a fleeting one,
but a moment held just long enough
to suggest that something
had been acknowledged between us
without needing words.

In that instant,
the ordinary world continued-
people moved, time passed,
the familiar hum of existence persisted-
yet something within me
had already shifted.

It was not attraction alone,
It was recognition,

As though a part of me
had been waiting
not consciously, not deliberately
but in some deeper, older place
where longing forms
before it has language.

You stood there,
not seeking to be noticed,
not offering anything beyond yourself
and yet,
in your stillness,
you held a gravity
that drew me inward
without resistance.

And I understood something
that I could not have learned from experience alone:

that certain flukes
do not enter our lives to be explained
they arrive to be felt,
to be remembered,
and to quietly begin
the process of transforming us
from within.

~ Dr Intaj Malek