तुम मेरे जीवन में
किसी आकस्मिक घटना की
तरह नहीं आए
न कोई उद्घोष था,
न कोई ऐसा कोलाहल
जिसने तुम्हारे आगमन
की घोषणा की हो।
तुम्हारा आना तो
एक मौन परिवर्तन था
मानो समूचा संसार
धीरेधीरे अपनी धुरी
पर
कुछ इस प्रकार पुनः
संतुलित हो रहा हो
कि उसे केवल
मेरे भीतर का सबसे
सजग,
सबसे संवेदनशील अंश
ही
पहचान सका।
सब कुछ आरम्भ हुआ
एक दृष्टि से।
वह क्षणिक दृष्टि
नहीं थी,
बल्कि उतनी देर तक
ठहरी हुई
कि बिना शब्दों के ही
यह संकेत दे सके
कि हमारे बीच
कुछ अनकहा स्वीकार
लिया गया है।
उस एक क्षण में
संसार अपनी गति से
चलता रहा
लोग आतेजाते रहे,
समय अपनी धारा में
बहता रहा,
जीवन का परिचित
कोलाहल
वैसा ही बना रहा
किन्तु मेरे भीतर
कुछ बदल चुका था।
वह केवल आकर्षण नहीं
था;
वह तो पहचान थी
मानो मेरे अस्तित्व
का कोई अंश
बहुत पहले से
तुम्हारी प्रतीक्षा
कर रहा था।
न सचेत रूप से,
न किसी संकल्प के साथ,
बल्कि उस गहरे,
बहुत प्राचीन अंतराल
में
जहाँ आकांक्षाएँ जन्म
लेती हैं
उससे भी पहले
कि उन्हें भाषा मिल
सके।
तुम वहाँ खड़े थे
न स्वयं पर किसी का
ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा,
न अपने होने के
अतिरिक्त
कुछ और देने का
प्रयास।
फिर भी,
तुम्हारी उस शांत
उपस्थिति में
एक अद्भुत गुरुत्व था,
जिसने बिना किसी
प्रतिरोध के
मुझे अपनी ओर खींच
लिया।
और उसी क्षण
मैंने वह सत्य जाना
जिसे केवल अनुभवों से
नहीं सीखा जा सकता।
जीवन की कुछ
मुलाकातें
हमारे जीवन में इसलिए
नहीं आतीं
कि उनका अर्थ समझाया
जा सके;
वे आती हैं
केवल अनुभव की जाने
के लिए,
स्मृतियों में अमर हो
जाने के लिए,
और बहुत शांत,
बहुत निस्संग ढंग से
हमारे भीतर ही भीतर
हमें रूपांतरित करने
की प्रक्रिया
आरम्भ कर देने के
लिए।
~ डॉ इन्ताज़ मलेक
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