Zen

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Monday, 14 September 2026

दो ख़ामोशियों के बीच उजाला


कभी-कभी
दो ख़ामोशियाँ मिलती हैं
और उनके बीच
कुछ अनाम-सा उजाला जन्म लेता है।

न कोई वचन,
न कोई नाम—
फिर भी भीतर
कुछ पहचान लेता है
वह जिसे वह सदियों से खोज रहा था।

शायद प्रेम
पाना या पा लेना नहीं,
बल्कि उस मौन पहचान का नाम है
जहाँ दो आत्माएँ
एक-दूसरे तक पहुँचने का
रास्ता पहले से जानती हैं।

और ख़ामोशी के पार
वह उजाला बना रहता है।

~ डॉ. इन्ताज़ मलेक 

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