कुछ जीवन
हम स्वयं चुनते हैं,
और कुछ
हमारे चयन से पहले ही
हमारे पास आ जाते हैं
पैतृक घरों की भाँति,
पुराने वृक्षों की छाया की भाँति,
या उन उत्तरदायित्वों की भाँति,
जो हृदय की भाषा समझने से पहले ही
कन्धों पर रख दिए जाते हैं।
और इस प्रकार
हम सम्मानित बने।
विश्वसनीय।
उत्तरदायी।
परिवारों के आधार।
उत्सवों के सहभागी।
तसवीरों में मुस्कुराते हुए चेहरे।
लेकिन किसी को यह ज्ञात नहीं था
कि इन सुव्यवस्थित ऋतुओं के नीचे
एक और देश था।
एक मौन देश।
जहाँ कोई मानचित्र नहीं था।
जहाँ दो साँसे
अनगिनत वर्षों से
एक-दूसरे से मिलती चली आ रही थीं।
हरदम बाहों में नहीं,
हरदम लफ्जों में भी नहीं,
किन्तु उस पहचान में
जो जीवन में केवल एक बार आती है,
और फिर कभी विदा नहीं होती।
वहाँ
एक दिन की दूरी भी
शीत ऋतु जैसी प्रतीत होती थी।
और साथ बिताई गई
एक दोपहर
इतनी ऊष्मा दे जाती थी
कि कई महीनों तक
हृदय उसी से जीवित रहता था।
जीवन ने हमें
अनेक नाम दिए।
अनेक सम्बन्ध दिए।
अनेक कर्तव्य दिए।
किन्तु उस मौन देश में,
जहाँ केवल साँसे निवास करती हैं,
हम मात्र
दो यात्री थे,
जिन्होंने
अनायास ही
एक-दूसरे के भीतर
अपना घर पा लिया था।
~ डॉ. इन्ताज मलेक
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