एक
घर है,
जहाँ
मैं प्रतिदिन जाता हूँ,
लेकिन
मेरे चरणों ने
कभी
उसकी देहलीज़ नहीं लाँघी।
वह
घर
किसी
नगर में नहीं बसता,
न
किसी पते पर उसका उल्लेख है।
वह
तो बसता है
दो
शब्दों के भीतर,
एक
परिचित स्वर के भीतर,
उन
संदेशों के बीच
जो
दायित्वों और व्यस्तताओं के बीच
चुपचाप
चले आते हैं।
मैं
पहचानता हूँ
तुम्हारी
थकान की ध्वनि।
मैं
जानता हूँ
कब
तुम्हारी मुस्कान
हृदय
की गहराई से उठी है,
और
कब वह केवल संसार के लिए
ओढ़ी
गई है।
मैं
उन लोगों के नाम भी जानता हूँ
जो
तुम्हारी भोजन-मेज़ के सहचर हैं,
जो
तुम्हारे दिनों के सहभागी हैं,
किन्तु
मैं,
मैं
वह अतिथि हूँ
जो
द्वार पर दस्तक भी नहीं दे सकता।
तुम्हारा
होना
अनेक
लोकों का होना है—
परिवार
का,
कर्तव्य
का,
प्रतिष्ठा
का,
अपेक्षाओं
का,
परम्पराओं
का।
और
कहीं बहुत भीतर,
ज्यों
परदे के पीछे
जलता
हुआ दीपक,
वैसे
ही
तुम्हारा
एक अंश
मेरा
भी है।
पूर्णतः
नहीं।
प्रकट
रूप से नहीं।
निश्चिन्त
होकर भी नहीं।
किन्तु
इतना अवश्य
कि
प्रत्येक प्रभात
जीवन
से भरा प्रतीत होता है।
इतना
अवश्य
कि
अनुपस्थिति भी
एक
ऐसा प्रदेश बन जाती है
जहाँ
मैं लौट-लौटकर आता हूँ।
और
कभी-कभी
मैं
सोचता हूँ—
यदि
कोई और युग
कुछ
अधिक उदार होता,
यदि
समय ने
हमारे
लिए कोई भिन्न आकाश रचा होता,
तो
क्या मैं वही होता
जो
तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा
द्वार
पर करता?
क्या
तुम्हारी संध्याएँ
मेरे
साथ समाप्त होतीं?
शायद।
किन्तु
इस अधूरी दुनिया में भी
मैं
कृतज्ञ हूँ
उस
स्थान के लिए
जो
तुमने
अपने
हृदय में मेरे लिए सुरक्षित रखा।
यद्यपि
मैं
तुम्हारे
घर में नहीं रह सकता,
फिर
भी मैं जानता हूँ
मैं
कहीं न कहीं
तुम्हारी
आत्मा के भीतर
निवास
करता हूँ।
और
कभी-कभी,
इतना
ही
सम्पूर्ण
संसार के समान
पर्याप्त प्रतीत होता है।
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