Krishna
Whispers in Scarecrow’s ears
खेतों के सन्नाटे में
लकड़ी और चीथड़ों का बना बिजूका
दिन-रात एक ही ढर्रे पर खड़ा रहता
तनकर, सहमाकर, चिड़ियों को दूर भगाता हुआ।
उसके लिए रक्षक होने का बस एक ही अर्थ था,
भय का ढाँचा बने रहना।
तभी पगडंडी से कान्हा गुज़रे।
उन्होंने देखा
सामने लहलहाती फसल थी,
ऊपर नीले गगन में भटकते भूखे पक्षी,
और बीच में खड़ा बिजूका,
जो निष्प्राण होकर भी डर बाँट रहा था।
कृष्ण बिजूके के पास रुक गए।
उसकी लकड़ी की काया को सहलाया
और बहुत आत्मीयता से कानों में कहा,
"सखा,
जो भय से रक्षा करे, वह केवल चौकीदार है,
पर जो प्रेम से थाम ले, वही सच्चा रक्षक है।
दाना केवल अनाज नहीं, ईश्वर का दिया प्रसाद है,
इन बेज़ुबान पंछियों का भी इस पर
कुछ अधिकार है।
अपने इस कठोर कर्म में थोड़ी
करुणा भर लो।"
कुछ क्षण वो बोल विलीन हो गए,
पर कृष्ण की साँस बिजूके के भीतर
समा गई।
अगली भोर, जब चिड़ियाँ डरी-सहमी उतरीं,
तो उन्होंने देखा,
बिजूका अब डराने वाला प्रेत नहीं
था,
उसके काठ के हाथों में एक छाँव
थी,
और हवा के साथ हिलते उसके
चीथड़ों में एक मौन स्वीकृति।
पक्षी उसके काँधों पर आ बैठे।
बिजूके की निष्प्राण काया में
पहली बार जीवन और प्रेम का
स्पंदन जाग उठा।
~ डॉ इन्ताज मलेक
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