कुछ प्याले
औपचारिकता में भर दिए जाते हैं।
कुछ
रीति-रिवाज़ निभाने के लिए।
लेकिन हर जीवन में
एक तीसरा प्याला भी होता है,
जो किसी निमन्त्रण का प्रतीक्षी नहीं होता,
जो अपने आप
किसी के लिए रखा रह जाता है।
मैंने ऐसा प्याला देखा है।
हमेशा एक ही मेज़ पर नहीं।
हमेशा एक ही छत के नीचे भी नहीं।
कभी किसी अनजान नगर में,
कभी किसी पेड़ की छाया में,
और कभी उन रातों में,
जब रास्ते भी
अपने नाम भूल जाते हैं।
कितना अजीब है,
कि अपनापन
किसी पते का मोहताज नहीं होता।
वह तो
एक परिचित हँसी में मिल जाता है,
या उस चेहरे में,
जिसे देखने के लिए
मन ने चुपचाप प्रतीक्षा की हो।
लोग बड़ी घटनाओं को याद रखते हैं।
लेकिन स्मृति का स्वभाव अलग है।
उसे याद रहती है
इलायची की महक,
काँच पर गिरती वर्षा की बूँदें,
शब्दों से पहले उतर आने वाली मुस्कान,
और वह शान्ति
जो केवल निकट बैठने से मिल जाती है।
दुनिया सोचती है
कि स्नेह को हमेशा बोलना चाहिए।
लेकिन सबसे मधुर चीजें
हमेशा चुप रहती हैं।
जैसे किसी प्रिय पुस्तक के पहले पन्ने।
जैसे किसी गीत की अधूरी पंक्ति।
जैसे उस प्याले की ऊष्मा,
जिसे कोई अपना
अभी-अभी रखकर गया हो।
और शायद,
जब सारी यात्राएँ समाप्त हो जाएँगी,
तो स्वर्ग भी
ऐसा ही होगा
जहाँ कोई जल्दी नहीं होगी,
कोई प्रश्न नहीं होंगे,
और कोई
धीरे से मुस्कराकर पूछेगा
"क्या तीसरा प्याला भी रख दूँ?"
- डॉ इन्ताज़ मलेक
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