Zen

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Saturday, 12 September 2026

बिजूके के कान में गुनगुनाए कृष्ण

 

Krishna Whispers in Scarecrow’s ears


खेतों के सन्नाटे में

लकड़ी और चीथड़ों का बना बिजूका

दिन-रात एक ही ढर्रे पर खड़ा रहता

तनकर, सहमाकर, चिड़ियों को दूर भगाता हुआ।

 

उसके लिए रक्षक होने का बस एक ही अर्थ था,

भय का ढाँचा बने रहना।

 

तभी पगडंडी से कान्हा गुज़रे।

उन्होंने देखा

सामने लहलहाती फसल थी,

ऊपर नीले गगन में भटकते भूखे पक्षी,

और बीच में खड़ा बिजूका,

जो निष्प्राण होकर भी डर बाँट रहा था।

 

कृष्ण बिजूके के पास रुक गए।

उसकी लकड़ी की काया को सहलाया

और बहुत आत्मीयता से कानों में कहा,

 

"सखा,

जो भय से रक्षा करे, वह केवल चौकीदार है,

पर जो प्रेम से थाम ले, वही सच्चा रक्षक है।

दाना केवल अनाज नहीं, ईश्वर का दिया प्रसाद है,

इन बेज़ुबान पंछियों का भी इस पर कुछ अधिकार है।

अपने इस कठोर कर्म में थोड़ी करुणा भर लो।"

 

कुछ क्षण वो बोल विलीन हो गए,

पर कृष्ण की साँस बिजूके के भीतर समा गई।

 

अगली भोर, जब चिड़ियाँ डरी-सहमी उतरीं,

तो उन्होंने देखा,

बिजूका अब डराने वाला प्रेत नहीं था,

उसके काठ के हाथों में एक छाँव थी,

और हवा के साथ हिलते उसके चीथड़ों में एक मौन स्वीकृति।

 

पक्षी उसके काँधों पर आ बैठे।

बिजूके की निष्प्राण काया में

पहली बार जीवन और प्रेम का स्पंदन जाग उठा।

~ डॉ इन्ताज मलेक

 

Wednesday, 9 September 2026

विदा कहने की कला में हम निपुण हो गए

किसी ने हमें नहीं सिखाया

कि इस प्रकार भी प्रेम किया जाता है।

 

न कोई ग्रन्थ मिला,

न कोई संस्कार,

न किसी ने आशीर्वाद दिया,

न किसी ने राह दिखाई।

 

हमारे हिस्से में आए

कुछ धीमे स्वर,

कुछ सावधानियाँ,

कुछ चुराए हुए क्षण,

जो स्मृतियों में बदलने से पहले ही

विदा हो जाया करते थे।

 

और धीरे-धीरे

हम विदा कहने की कला में

माहिर हो गए।

 

हँसी के बाद विदा।

मुलाक़ात के बाद विदा।

लम्बे आलिंगनों के पश्चात्

अधूरी विदा।

 

उन वचनों के साथ विदा

जो फिर मिलने की आशा लिए होते थे।

 

और कभी-कभी

इससे पहले ही विदा,

कि संसार को कुछ ज्ञात हो।

 

दूसरे लोग

साथ-साथ वृद्ध होने के स्वप्न देखते हैं।

हम कैलेंडरों की ओर देखते हैं।

अवसरों की ओर।

स्थगित योजनाओं की ओर।

बहानों की ओर।

और उन दूरियों की ओर

जो मीलों में नहीं,

लेकिन उत्तरदायित्वों में नापी जाती हैं।

 

फिर भी,

एक विचित्र चमत्कार

आज भी विद्यमान है।

ऋतुएँ बदल गईं।

 

चेहरों ने समय का स्पर्श स्वीकार किया।

बालों में चाँदी उतर आई।

किन्तु प्रत्येक रात्रि,

निद्रा से पहले,

मेरे विचार

उसी एक व्यक्ति की ओर प्रस्थान करते हैं।

 

अकेलेपन के कारण नहीं,

अपितु इसलिए

कि इस विशाल संसार में

एक आत्मा ऐसी है

जिसने मेरी आत्मा का आकार

पहचान लिया है।

 

शायद इतिहास

हमारे नाम कभी न जाने।

शायद समाज

हमारी निःशब्द निकटता को

समझ न पाए।

 

किन्तु प्रेम को

प्रशंसा की आवश्यकता कब रही है?

उसे तो केवल

स्थिर बने रहने की आवश्यकता होती है।

 

और हम

समय, दूरी और परिस्थितियों के बीच भी

स्थिर रहे हैं।

 

    ~ डॉ इन्ताज मलेक

   

जहाँ मैं ठहर नहीं सकता

एक घर है,

जहाँ मैं प्रतिदिन जाता हूँ,

लेकिन मेरे चरणों ने

कभी उसकी देहलीज़ नहीं लाँघी।

 

वह घर

किसी नगर में नहीं बसता,

न किसी पते पर उसका उल्लेख है।

 

वह तो बसता है

दो शब्दों के भीतर,

एक परिचित स्वर के भीतर,

उन संदेशों के बीच

जो दायित्वों और व्यस्तताओं के बीच

चुपचाप चले आते हैं।

 

मैं पहचानता हूँ

तुम्हारी थकान की ध्वनि।

 

मैं जानता हूँ

कब तुम्हारी मुस्कान

हृदय की गहराई से उठी है,

और कब वह केवल संसार के लिए

ओढ़ी गई है।

 

मैं उन लोगों के नाम भी जानता हूँ

जो तुम्हारी भोजन-मेज़ के सहचर हैं,

जो तुम्हारे दिनों के सहभागी हैं,

किन्तु मैं,

मैं वह अतिथि हूँ

जो द्वार पर दस्तक भी नहीं दे सकता।

 

तुम्हारा होना

अनेक लोकों का होना है—

परिवार का,

कर्तव्य का,

प्रतिष्ठा का,

अपेक्षाओं का,

परम्पराओं का।

 

और कहीं बहुत भीतर,

ज्यों परदे के पीछे

जलता हुआ दीपक,

वैसे ही

तुम्हारा एक अंश

मेरा भी है।

 

पूर्णतः नहीं।

प्रकट रूप से नहीं।

निश्चिन्त होकर भी नहीं।

किन्तु इतना अवश्य

कि प्रत्येक प्रभात

जीवन से भरा प्रतीत होता है।

 

इतना अवश्य

कि अनुपस्थिति भी

एक ऐसा प्रदेश बन जाती है

जहाँ मैं लौट-लौटकर आता हूँ।

 

और कभी-कभी

मैं सोचता हूँ—

यदि कोई और युग

कुछ अधिक उदार होता,

यदि समय ने

हमारे लिए कोई भिन्न आकाश रचा होता,

तो क्या मैं वही होता

जो तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा

द्वार पर करता?

 

क्या तुम्हारी संध्याएँ

मेरे साथ समाप्त होतीं?

शायद।

 

किन्तु इस अधूरी दुनिया में भी

मैं कृतज्ञ हूँ

उस स्थान के लिए

जो तुमने

अपने हृदय में मेरे लिए सुरक्षित रखा।

 

यद्यपि मैं

तुम्हारे घर में नहीं रह सकता,

फिर भी मैं जानता हूँ

मैं कहीं न कहीं

तुम्हारी आत्मा के भीतर

निवास करता हूँ।

 

और कभी-कभी,

इतना ही

सम्पूर्ण संसार के समान

पर्याप्त प्रतीत होता है।

      ~ डॉ इन्ताज मलेक