कुछ धुनें ऐसी होती हैं
जो कभी महफ़िलों में नहीं गाई जातीं,
फिर भी उम्र भर साथ चलती हैं।
इसलिए नहीं कि उन्हें कोई शर्म है,
बल्कि इसलिए कि कुछ संगीत
सुनने वाले दिलों के लिए रचे जाते हैं,
भीड़ भरे सभागारों के लिए नहीं।
शायद इसी वजह से
तुम्हारी याद आती है
जैसे दूर किसी कमरे में रखे
पुराने दीप को याद किया जाता है
जो न कभी ध्यान खींचता है,
न अपने होने का ऐलान करता है,
फिर भी न जाने कैसे
अँधेरे को थोड़ा और मेहरबान बना देता है।
हमारे दिनों ने अब
अपनी जानी-पहचानी लय पा ली है।
कुछ चेहरे हमारा इंतज़ार करते हैं।
कुछ आवाज़ें हमें उन नामों से पुकारती हैं
जिन्हें दुनिया पहचानती है।
और हम जवाब देते हैं,
क्योंकि अपनापन कई रूपों में आता है,
और मेहरबानी के भी
अनगिनत घर होते हैं।
फिर भी कहीं,
शब्दों से बहुत दूर,
एक ख़ामोश जगह रहती है,
जो न यादों की है,
न कल्पना की।
वहाँ
कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।
कोई वादा नहीं।
कोई सवाल नहीं।
बस एक-दूसरे को पहचान लेना
है।
जैसे दो किताबें
अलग-अलग अलमारियों पर रखी हों,
दो अलग हाथों से लिखी गई हों,
फिर भी रोशन होती हों
पढ़ने के उसी एक दीप से।
और कभी-कभी,
जब दुनिया अब भी सो रही होती है,
मैं कल्पना करता हूँ कि कहीं
पहली केतली के गुनगुनाने से पहले,
क़दमों के अपने काम में लगने से पहले,
तुम भी किसी खिड़की के पास ठहरते हो
और उस ख़ामोशी को सुनते हो
जो सुबह आने से ठीक पहले
धरती पर उतरती है।
शायद तुम मुस्कुराते हो।
शायद कुछ भी नहीं सोचते।
फिर भी एक अजीब-सा सुकून मिलता है
यह सोचकर
कि कहीं एक और रूह है,
जिसकी ख़ामोशियाँ
मेरी ख़ामोशियों से परिचित हो गई हैं।
न यह किसी को अपना बना लेने की चाह,
न सिर्फ़ तड़प,
न नामुमकिन ख़्वाबों का दुख।
बस वह अजीब-सा सुकून,
जो तब उतरता है
जब दो मुसाफ़िर,
अलग-अलग राहों पर चलते हुए,
यह जान पाते हैं कि बरसों से
एक ही दूर के सितारे ने
उनकी राह रोशन की है।
और जब आख़िरकार भोर उतरती है,
अपनी ठहरी हुई हथेलियों से
छतों और पेड़ों को छूती हुई,
तो अक्सर मन ही मन कह उठता हूँ—
कितनी ख़ुशनसीब है यह दुनिया,
कि इसमें छिपे हुए सुर हैं,
अनजानी ख़ुशबुएँ हैं,
और कुछ ऐसे अपनापन भरे एहसास,
जो नाम पाए बिना भी
धरती को अपनी दुआओं से महकाते रहते हैं।
उस दीप की तरह,
जो भोर में भी
ख़ामोशी से जलता रहता है।
~ डॉ. इन्ताज मलेक